भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है। - टी. माधवराव।
पराया सुख (कथा-कहानी)    Print  
Author:यशपाल | Yashpal
 

सूर्योदय हो गया है या नहीं, जान नहीं पड़ता था। आकाश घने बादलों से घिरा था। पानी के बोझ से भारी ठंडी हवा कुछ तेजी से बह रही थी। पठानकोट स्टेशन के मुसाफ़िर खाने में बैठे हुऐ पहाड़ जानेवाले यात्री, कपड़ों में लिपट लिपट कर लारियों के चलने के समय की प्रतीक्षा कर रहे थे। लारियों के ड्राइवर मुसाफ़िरों की तलाश में इधर-उधर दौड़ रहे थे। जितनी चिन्ता मुसाफ़िरों को आगे जाने की थी उससे कहीं अधिक चिन्ता थी इन ड्राइवरों को मुसाफ़िरों को उनके घर पहुँचा देने की।

स्टेशन के लम्बे सूने प्लेटफार्म पर कभी कोई रेलवे कुली नजर आ जाता। मि० सेठी मोटा गरम सूट और ओवरकोट पहने एक तरफ प्लेटफार्म के किनारे बंधी पत्थर की पटिया पर टहल रहे थे। उनके गरम कपड़ों को छेद शरीर को छू लेने की ताब पहाड़ी ठंडी हवा को न थी। वह केवल उनके चेहरे और सिर के बालों को ही सहला रही थी। वायु की यह शीतलता, जो सैकड़ों गुसाफ़िरों के प्राण खींचे ले रही थी, सेठी को स्फूर्ति दे रही थी। इस शान्ति में वे स्वयं अपने ही भीतर समा जाने का प्रयत्न कर रहे थे।

लारियों के ड्राइवर अपने शिकार मुसाफ़िरखाने में ढूंढ रहे थे। कारों के ड्राइवर, डरते-डरते स्टेशन के वेटिंग रूम की जालियों से अपनी आसामियों को भाँप रहे थे। एक ड्राइवर ने अदब से सेठी को सलाम करके कहा "हुजूर बहुत कम्फ़र्टेबल गाड़ी है।"

सेठी ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया। इस समय वह ठंडी वायु का आनन्द ले रहे थे। उत्तर देकर अपनी शान्ति भंग करने की जरूरत नहीं थी।

गाड़ी में जगह न मिलने का सवाल उनके सामने न था। गाड़ी में जगह ढूंढ़ने की जरूरत ही न थी। गाड़ियाँ उनके पीछे-पीछे फिरती हैं। ड्राइवर दूर खड़ा होकर साहब के हुकुम की प्रतीक्षा कर रहा था परन्तु सेठी का ध्यान उस ओर न गया।

सेठी ने देखा, जनाना वेटिंग रूम का दरवाजा खुला। एक युवती लम्बा, काला कोट और सफ़ेद साड़ी पहने निकली। उसकी उंगली पकड़े एक प्रायः डेढ़-दो बरस का बालक साथ था। युवती उस सूने प्लेटफ़ार्म के दूसरी ओर को चल दी।

इस शान्ति में अचानक एक विचार सेठी के मन में उठा। बच्चे को उँगली थमाकर पूर्व की ओर मुख किये चली जाती हुई वह युवती उसे सफल जीवन का रूप जान पड़ी। अपना जीवन उसे जान पड़ता था निष्प्रयोजन, निरुद्देश्य-सा; वायु में उगते हुए मेघ के एक अवारा टुकड़े की भाँति और युवती का जीवन उसे लगा एक सजल मेघ की भाँति, जो बरस कर फ़सल से भरे श्यामल खेत पर छा रहा हो। उस बालक की वह छोटी-छोटी गुदगुदी टांगें, उस की वह लटपटी चाल, उसका माँ की उँगली से लटके-लटके चलना, माँ की संतुष्ट, गंभीर और स्थिर गतिः -- वाणिज्य से लदी हुई नौका की भाँति जो स्थिर जल में गम्भीर चाल से चली जाती है।

सेठी लालटेन के खम्भे के सहारे पीठ टिकाकर उस माँ-बच्चे, युवती-बालक की जोड़ी की ओर देखता रहा। स्टेशन की इमारत की दूरी तक जाकर युवती लौट पड़ी। लौटते समय उसने दायें हाथ की उँगली छुड़ा कर बालक को बाँये हाथ की उंगली थमा दी और वह सेठी की ओर आने लगी। लता से लटके फल की तरह वह बालक अपना जीवन युवती से ले रहा था। समीप प्रत्येक कुछ कदमों पर युवती का चेहरा और बालक की आकृति सेठी की दृष्टि में स्पष्ट हो रही थी। युवती का गोरा रंग, पतला छरहरा बदन, स्वास्थ्य की झलक, बड़ी-बड़ी आँखें; बालक की छोटी-सी नाक, गोल-गोल, आँखें, फूले हुये गाल चेहरे पर खून की ताज़गी, यह सब सेठी को ऐनक के शीशे की राह दिखाई दे रहा था। ताज़ी वायु की शीतलता से शान्ति लाभ करने की बात सेठी भूल गया।

कार के ड्राइवर ने मेम साहब को सलाम कर संक्षेप में कुछ पूछा। उसके बाद एक लारी ड्राइवर ने सलाम कर बात की।

सेठी कारोबारी आदमी है। वह समझ गया कि मेम साहब सस्ती और अच्छी सवारी की तलाश में हैं। लारी सात बजे से पहले सफर नहीं कर सकती परन्तु कार के लिये कोई बन्दिश नहीं है। लारी के मुसाफ़िर प्रतीक्षा कर रहे हैं, क्योकि उनके लिये सड़क बन्द है। कार के मुसाफ़िर प्रतीक्षा कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें जल्दी नहीं। एक खयाल सेठी के मन में आया। लालटेन के खम्भे का आसरा छोड़कर सीधे खड़े हो उसने ड्राइवर की ओर देखा। ड्राइवर ने दौड़कर सामने हाजिर होकर दूसरी बार सलाम किया। सेठी ने पूछा--- "गाड़ी ठीक है ।"

"हुजूर बिल्कुल न्यू... "आस्टिन सेलून।"

"अच्छा।"

"हुजूर और सवारी तो नहीं बैठेगी?"

"नहीं एकदम जायगा....। तुमको कुछ पैसा बनता है तो बैठा लो कोई एक सवारी।"

ड्राइवर ने और भी लम्बा सलाम किया। वेटिंग रूम से सेठी का सामान निकला, तीन बड़े सूट केस और एक बड़ा होल्डील और छोटे-मोटे अटैची केस ड्राइवर ने तुरन्त फिर मेम साहब को सलाम बोला और फोकट की एक सवारी का सौदा सस्ते में कर लिया।

सेठी यह सब देख रहा था। मेम साहब का संक्षिप्त सामान भी निकला, केवल एक सूटकेस और होल्डोल। बच्चे को लेकर वे भी सेठी के पीछे-पीछे कारकी ओर चली। बजाय पीछे बैठने के सेठी ड्राइवर के साथ आगे बैठ गया। मेम साहब और उनका बालक पीछे बैठे।

कार ठण्डी हवा को चीरती हुई दौड़ चली। सेठी अपनी पीठ के पीछे एक मौजूदगी अनुभव कर सन्तोष पा रहा था। पूरी गाड़ी का किराया भरने के बावजूद उसे अगली तंग सीट पर बैठना नागवार न गुजरा। सामने तेज़ी से दौड़ते हुए वृक्षों और सड़क किनारे के मकानों को देख कर मेम साहब का बालक अगली सीट को पकड़ कर कूद रहा था। उसके इस उत्पात से कभी सेठी की टोपी हिल जाती, कभी वह उसकी बाँह में सिर मार देता। बालक की इस धृष्टता के कारण उसकी माँ को संकोच हो रहा था। उसने कई दफ़े बालक को शांत रहने के लिये कहा, मीठी धमकी दी परन्तु उससे सेठी और माँ दोनों को ही हँसी आ गयी। बालक कूद कर अगली सीट पर पहुँच जाना चाहता था। सेठी ने पीछे घूम उसे उठाकर अपनी गोद में बैठा लिया। बालक के मांसल, पुष्ट कोमल देह के स्पर्श से उसके शरीर में एक प्रद्भुत स्फूर्ति अनुभव हुई। एक नवीन अनुभूति ने उसके मन को घेर लिया। उसको अब तक का बड़े यत्न और संघर्ष से सफल बनाया हुआ अपना जीवन सहसा असफल और निष्प्रयोजन-सा जान पड़ने लगा। वह बालक के मुख की ओर देख रहा था और अपने जीवन में उसे एक बहुत बड़ा अभाव अनुभव हो रहा था।

मोटर के सामने दौड़ते हुए दृश्य में सेठी को अपने जीवन की कहानी सिनेमा के हृदय की तरह दिखाई देने लगी। पिता के देहान्त के कारण एफ० ए० में उसको पढ़ाई छोड़ने के लिये मजबूर हो जाना, जीविका का कोई उपाय न पाकर उसका भटकना, ठेकेदार के यहाँ बीस रुपये माहवार पर उसका चौबीस घन्टे हड्डी तोड़ परिश्रम, दूसरे ठेकेदारों का काम ठेके पर कराना और बड़ा ठेकेदार बन जाना, एक के बाद दूसरा ठेका। जिस रुपये की वजह से उसे दर-दर मारा फिरना पड़ा था, उसी रुपये का हज़ारों लाखों की तादाद में उस के हाथों से आना-जाना। रेल के पुल के ठेके में एकमुश्त ढाई लाख का मुनाफा...।

सेठी ने जीवन में एक चीज, रुपये को पहचाना। उसकी प्राप्ति में उसने दिन को दिन और रात को रात न समझा। आज वह लखपति है। अपनी कमाई के बल पर बड़ी से बड़ी कम्पनियों में उसके हिस्से हैं। जेब में पड़ी इम्पीरियल बैंक की चार अंगुल चोड़ी चेक बुक पर कुछ अंकुर लिखकर दस्तखत कर देने से वह क्या नहीं कर सकता? लेकिन इस बीच रुपये के अतिरिक्त उसने क्या पाया?...रुपये से क्या नहीं पाया जा सकता?...... 'उनके वे सम्बन्धी जिन्हें वह पहचानता नहीं, पहचानने की जरूरत भी नहीं समझता, उसके नाम से अपना परिचय देते हैं। स्नेह से भरा हृदय लेकर उसकी ओर दौड़ते हैं।सम्मान की उसके लिये कमी नहीं। राजनैतिक और सामाजिक संस्थायें उसे अपना संरक्षक और सभापति बनाने के लिये व्याकुल हैं परन्तु इस सबसे उसे क्या मिलता है?

प्रेम और प्रणय के कितने ही अभिनय उसे घेर कर हुए। उन लजीली और मुग्ध आँखों में उसे दिखाई दिया केवल उसके रुपये का लोभ। उसे फँसाने का यत्न यह सब देखकर वह भीगी मक्खी क्यों कर निगल जाता? उसे किसी ने आकर्षित नहीं किया। गुड़ की भेली पर मण्डराने वाली मक्खियों और ततइयों की तरह वह उन्हें हँका देता। उसका लक्ष्य था, रुपया!

रुपये की आज उसे कमी नहीं परन्तु फिर भी वह कमाता है। रुपये को बढ़ाना, बस यही उसके जीवन का उद्देश्य है। रुपया अब उसकी ओर यों बहता है जैसे बरसात में छोटे-मोटे नाली-नालों का पानी नदी में आ इकट्ठा होता है ! उसके द्वारा तैयार की हुई व्यवस्था में सैकड़ों जगह हजारों आदमी परिश्रम करते हैं और रुपया पैदा करते हैं और वह रुपया व्यवस्था की नालियों से बहकर सेठी के हिसाब में जा पहुंचता है। उसका काम है, धन और रुपया बहाकर लाने के लिये नई नालियाँ तैयार करना।

अपने खर्च की उसे चिन्ता नहीं। उसे कोई शौक नहीं। अकेला आदमी खर्च किस चीज पर करे? उसका जाती खर्च कभी हजार बारह सौ माहवार
से अधिक नहीं हुआ। सुख की ओर कभी उसका ध्यान ही नहीं गया। परन्तु आज अचानक ठण्डी हवा की फरफराहट से शान्त मस्तिष्क में इस एक नई अनुभूति प्रभाव का अनुभव उसे हुआ।

वह बालक अपने जूतों को उसके बढ़िया कोट पर रख कर खड़ा हो, मोटर के बरफ़ के समान ठण्डे काँच पर हाथ रख कर, काँच पर अपना मुँह चिपका कर खुशी से किलकिला रहा था। उसके पैरों से रौंदे जाने में सेठी को सुख अनुभव हो रहा था। उसकी आँखें आर्द्र हो गयीं। उसके मुख का एक कोना भीतर को खिंच गया। वह एकटक दृष्टि से उस बालक की व्यस्तता को देखता रहा। अपने कानों के पास पीठ पीछे उसे अनुभव हो रही थी एक उपस्थिति, एक व्यग्र वात्सल्यमय उपस्थिति जो वृक्षों की छाया के समान व्यापक और वृक्ष को जन्म देने वाले फूल के समान आकर्षक थी जो सन्तान के सिर पर रक्षा और धैर्य का हाथ रखती है और पुरुष के हृदय में इच्छा का तीर मार देती है। जिसकी मुस्कराहट सतरङ्ग धनुष बना देती है। जिसमें प्रणय का कटाक्ष, रक्षा का आश्वासन, आशीर्वाद की छाया, वासना की झिल-मिल सभी एक साथ शामिल है। इस प्रकार का एक चुम्बक उसे ऊपर की ओर और गोद में पकड़े हुए बालक का आकर्षण नीचे की ओर खींच रहा था। एक नये ही अनुभव की अवस्था में वह कुछ भूला सा, कुछ खोया सा मग्न था; एक विद्युत-सी उसके शरीर को विचलित किये हुये थी।

मोटर पहाड़ के ऊपर जा रही थी और ठण्डक बढ़ती जा रही थी। बादल घने होते जा रहे थे। हवा पानी के बोझ से भारी थी। मोटर के काँच पर पानी जम जमकर बूंदें बह रही थीं। काँच पर धुन्द साफ़ करने वाला यन्त्र लगातार ड्राइवर के सामने के भाग को साफ़ कर रहा था और बालक उसे पकड़ लेने को उत्सुक था। सेठी उसकी भरी हुई गोल बाहों को रोके हुए था। उन्हें छोड़ देने को उसकी तबीयत न चाहती थी। बालक ने उलटकर सेंडी की ओर देखा, सेठी की नकटाई के नग जड़े पिन ने उसका ध्यान आकर्षित किया। वह उसे खींचने का यत्न करने लगा। पिन उतार कर सेठी ने उसके कोट पर लगा दिया। मोटर में पहरने की उसकी शरबती रंग की अजीब-सी बड़ी ऐनक बालक के मुँह पर पहुँच गई, जिसमें उसका आधा चेहरा छिप गया। उस ऐनक के शीशों में सेठी को प्रतिबिम्ब दिखाई दिया, पिछली सीट पर बैठी माँ होठों पर उँगली रख बालक को शान्त रहने का संकेत कर रही है।
सेठी ने पीछे घूमकर माँ की ओर देख सिफ़ारिश में कहा-- "इट इज आल राइट, कोई बात नहीं।" उसके होठों पर एक करुण मुस्कराहट थी। उससे माँ का हृदय पिघल गया।

ड्राइवर ने मोटर की चाल धीमी कर दी और मुआफ़ी माँगने के स्वर में कहो- "हुजूर ! ऊपर बड़े ज़ोर का पानी बरस रहा है, कोहरा बहुत ज़बरदस्त
है।"

सेठी ने उत्तर दिया-- "ओ, इट इज माल राइट ।"

पहाड़ के ऊपरी भाग में बरसने वाला पानी बह-बहकर सड़क के किनारे झरने बना रहा था। उस पानी को चीरती, फव्वारे की तरह हवा में पानी उड़ाती मोटर घूम-घूम कर ऊपर ही ऊपर चढ़ती जाती थी। साइन्स के चिराग़ को रगड़कर वश में किया हुआ यह मोटर का दैत्य पहाड़ की सख्त चढ़ाई, बादलों के कोहरे और बौछारों की परवाह न कर ऊपर चढ़ता ही जा रहा था।

दो घण्टे तक लगातार चलकर वे "अधमार्ग" के डाक बँगले में आ पहुँचे। मोटर घूमकर अहाते में पहुँची और ड्योढ़ी में आकर खड़ी हो गयी। बंगले के अहाते के बाहर अनेक यात्री टीन और फूस की छतों के नीचे आधे भीगते हुए बैठे थे। पहाड़ों में बोझा ढोने वाले बैल और खच्चर जहाँ-तहाँ पानी में भीगते भयातुर दृष्टि से मनुष्यों की ढीली-ढाली और उत्साहहीन चाल-ढाल देख रहे थे। मनुष्य बादल और सरकारी हुकुम की प्रतीक्षा कर रहे थे और उनके पशु उनके निर्णय की। रात भर ज़ोर की बारिश के कारण ऊपर सड़क पर कई जगह पहाड़ गिरकर सड़क रुक गयी थी। मुसाफ़िरों को आगे जाने का हुकुम नहीं था।

ड्राइवर ने मोटर का दरवाज़ा खोला। सेठी उतरा और बालक सेठी की उँगली पकड़े हुए था। उसके पीछे मेम साहब उतरीं। डाक बंगले के चपरासी और खानसामे ने कार को देखकर सलामें दीं। वर्दी पहने खानसामा ने निहायत अदब से नाश्ते के लिये पूछा। सेठी ने कहा-- "हाँ। "

मेम साहब बच्चे के लिये पिटारी में दूध की बोतल लिये थीं। अपने लिये उन्हें खास ज़रूरत न थी। साठ रुपया महीना पानेवाली स्कूल मास्टरनी को डाक बँगले में नाश्ता करने की आदत नहीं होती। बरामदे की एक आराम कुर्सी पर बैठकर मेम साहब ने सेठी की ओर देखे बिना बल्लू (बालक) को आकर दूध पी लेने के लिये कहा।

सेठी ने मेम साहब की ओर देखे बिना कहा-- "बल्लू गरम दूध पियेगा।" नाश्ता मेज़ पर रखा जाने के बाद खानसामा ने मेम साहब को सूचना दी, मानो साहब, मेम साहब और बच्चा एक ही हैं।

मेम साहब को खानसामा का यह समझना कुछ अजीब तो लगा परन्तु अस्वाभाविक नहीं जान पड़ा। सेठी की ओर देखकर नम्र और तकल्लुफ़ के स्वर से उन्होंने अँग्रेजी में कहा-- "मुझे तो आवश्यकता नहीं।"

शिष्टता से सेठी ने आग्रह किया--"इतनी सर्दी में एक प्याला गरम चाय अच्छा ही है।"

नाश्ते के लिये वे भीतर बैठे उस अकेले कमरे में आना-जाना केवल खानसामा का ही था। दीवारों से परे ओझल बाहर जगत की दृष्टि में वह पति-पत्नी और बालक का एक छोटा सा परिवार था और उस संसार का प्रतिनिधि या साक्षी था केवल वह खानसामा। उसके सामने व्यर्थ संकोच कर अपने आप को भयभीत और अपराधी प्रमाणित करना मेम साहब को भी उचित न जँचा। उन्होंने बिलकुल निसंकोच भाव से प्यालों में चाय उड़ेलना शुरू किया। सेठी ने आमलेट का एक छोटा-सा टुकड़ा बल्लू के मुँह में दिया। वह मुँह भरकर खाने लगा।

खानसामा मेमसाब की पीठ पीछे आकर पूछता-- "कुछ बिस्कुट, कुछ जाम, कुछ फ्रूट ?"

उत्तर देता--सेठी "लाओ!"

जिन चीज़ों के आसानी से बिक जाने की आशा न थी वे सब खुलकर प्लेटों में, अधखुले डिब्बों की शक्ल में मेज़ पर आने लगीं। सेठी हँसता जाता था और बच्चे को एक-एक चीज चखाता जाता था माँ बालक की खुशी को देखकर गद्गद् हो रही थी। वह सेठी को मना करती जाती थी-- "बस कीजिये, ज्यादा नहीं, अब इसे भूख नहीं।"

बालक की सहायता से संकोच दूर कर सेठी ने पूछा-- "आप डलहौजी में ही रहती हैं?"

"जी हाँ, मेरा नाम मिसेज़ मदन है। मि० मदन मिलिटरी अकाउण्ट्स, दफ्तर में हैं। मैं स्कूल में पढ़ाती हूँ। बहिन से मिलने अमृतसर गयी थी।"

सेठी अपना क्या परिचय दे? उसने केवल कहा-- "अच्छी बात है।" अपने सम्बन्ध में कुछ कहने लायक बात ही उसकी समझ में न आयी। उसे अपना जीवन नितान्त आधार-रहित, रूप-रहित जान पड़ रहा था।

आप यहाँ डलहौजी में गर्मियों के लिये जा रहे हैं ?"--मिसेज़ मदन ने पूछा।

"नहीं, ऐसे ही कारोबार के सिलसिले में कुछ दिन रहूँगा। डलहौजी जगह अच्छी है। बहुत अच्छी जगह है। बहुत ही सुन्दर दृश्य है - आप बाल-बच्चों को साथ नहीं लाये?" --आंतरिकता के स्वर में मिसेज़ मदन ने प्रश्न किया।

"नहीं... हैं ही नहीं... शादी मैंने नहीं की। मेरा नाम आर० एल० सेठी है। ठेकेदारी भी करता हूँ। अमृतसर का नया गिरजाघर मैंने ही ठेके पर बनवाया
है।" दीवार की ओर देखते हुए चाय के प्याले में चम्मच चलाते हुए उसने कहा--"मैं ऐसे ही रहता हूँ।"

एक करुणा और दुःख का बोझ सेठी के शब्दों से मिसेज़ मदन के मन पर आ बैठा। वह सोचने लगी--"कितना भला और कितना अमीर आदमी है !"

बल्लू सेठी की चमड़े की चेन में बँधी सोने की घड़ी को मेज पर घसीट रहा था।

मिसेज़ मदन ने उँगली उठाकर कहा-- "ना !" और फिर सेठी की ओर देख हँसकर कहा-- "यह बड़ा ही शैतान है.....।"

सेठी बार-बार अपने बालों में उँगलियाँ चला रहा था। इसका कारण शायद उसके विचारों की उलझन थी। बहुत कुछ प्राप्त करके भी उसे अपना जीवन निराधार जान पड़ता था, ठीक एक लँगड़े की तरह। सामने बैठी हुई मिसेज मदन का कोहनी मेज़ पर रख कर अपने बालक की ओर देखना, उसका स्वच्छ खिला हुआ चिकना चेहरा, बड़ी-बड़ी रस भरी आँखें, सिर पर से साड़ी का पल्ला खिसक जाने से बालों से भरा सिर उसके लाल ओंठ, कोट के कालर से बने तिकोन में गले के नीचे का भाग, ये सब उसे एक जीवन के प्रतीक जान पड़ रहे थे जो उसकी पहुँच के बाहर था।

मिसेज़ मदन की दृष्टि सेठी की आँखों की ओर गयी। उसने अनुभव किया कि सेठी की दृष्टि उसके शरीर को लपेटे ले रही है। एक सिहरन-सी शरीर में अनुभव हुई परन्तु वह दुखदायक न थी, उससे उल्टा एक अधिकार का भाव मिसेज़ मदन के व्यवहार में दिखाई दिया। दोनों हाथ मेज़ पर रख कर बिलकुल सीधे, चमकती आँखों से सेठी की ओर देखकर उन्होंने कहा-- "कितने जोर की बारिश है! हम लोग कैसे पहुँचेंगे?"

सेठी ने जेब से सोने का सिगरेट केस निकाला। सिगरेट मुँह में लेकर जला लिया और बेतकल्लुफ़ी से धुआँ छोड़ते हुए उसने कहा-- "ये बारिश न भी रुके, आज हम न भी पहुँचें तो क्या हर्ज होगा?"

दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में फँसाते हुए चिन्ता के स्वर में पर मुस्कराकर मिसेज़ मदन ने कहा-- “जी मुझे तो कल स्कूल में हाज़िर होना है। आप भी तो कारोबार से जा रहे हैं, आपका भी तो हर्ज होगा।"

“हाँ जिस काम के लिये आया हूँ शायद वह न हो सके।" -- बरामदे में खड़े खानसामा की तरफ देख उसने पुकारा-- "देखो!"

खानसामा ने तुरन्त तश्तरी में बिल हाज़िर किया। बिल की तरफ न देख कर मिसेज़ मदन बोलीं-- "ड्राइवर को पूछो कब तक चलना होगा!”

बिल को अपनी ओर खींचते हुए सेठी ने कहा-- "जब मैं स्कूल में पढ़ता था सदा यही चाहता था कि स्कूल में छुट्टी रहे या किसी बहाने से स्कूल न जाना पड़े परन्तु देखता हूँ कि आपको स्कूल बहुत प्यारा है।"

मिसेज मदन ने उत्तर दिया-- "आप शरारती लड़के रहे होंगे---आज भी आप शायद काम-काज से बचने के लिए चाहते होंगे कि बारिश होती रहे और आप यहाँ बहाने से मजे में सिगरेट पीते रहें ?" और हँस दीं।

"हाँ, चाहता तो ज़रूर हूँ ।"

--"आपका दिल अपने बिजनेस में नहीं लगता?”

--"कभी सोचा ही नहीं ! ऐसा मालूम होता है कि जीवन की गाड़ी को कीचड़ में खींचता रहा हूँ।"

ड्राइवर ने आकर खबर दी कि सड़क अभी तक नहीं खुली। सेठी ने पुलिस स्टेशन पर फ़ोन करके पता लिया कि छः घण्टे से पहले सड़क के खुलने की कोई आशा नहीं है।

इस खबर से मिसेज़ मदन को घबराते देखकर सेठी ने कहा--"आपके स्कूल वाले समझ सकते हैं कि सड़क बना लेना आपके हाथ में नहीं है।"

मिसेज़ मदन का बिस्तर एक कमरे में खोल दिया गया और वे कमरे में चली गयीं। बालक कभी उस कमरे मे जाता कभी सेठी के पास आता। मिसेज़ मदन के उठकर चले जाने से सेठी को ऐसा जान पड़ा मानो उसके अधिक खाकर बीमार पड़ जाने के डरसे उसके आगे से थाली छीन ली गयी हो पर उसकी भूख अभी शेष थी। वह आराम कुर्सी पर लेटकर आकाश में मंडराते बादलों की ओर देखता और कभी बरामदे में टहलने लगता, फिर बैठ जाता और फिर टहलने लगता। उसके हिसाबी दिमाग़ में उस दिन कल्पना ने घर कर लिया। उसकी आँखों के सामने उसके अपने जीवन का ही चित्र दिखाई दे रहा था, जिसमें वह रुपये के पीछे नहीं परन्तु किसी और ही वस्तु के पीछे दौड़ रहा था। उसे जान पड़ता था कि वो सामने के दुर्गम पहाड़ पर चढ़ रहा है; आगे जाते एक नारी शरीर को पकड़ लेने के लिये। और जब वह हाथ फैला कर उसका पैर पकड़ लेना चाहता है, तो शरीर पहुँच से परे हो जाता है। वो शरीर था, एक झीने से बादल में लिपटी हुई मिसेज़ मदन का !

टहलते टहलते वह फिर आराम कुर्सी पर बैठ गया। उसी समय भीगी घास और वृक्षों पर सूर्य की नई धुली किरणें फैल गईं। सूर्य के यों सहसा उघड़ आने से सेठी की आँखे चौंधिया गईं। उसे खयाल आया, वह कितना असमर्थ है। वह उठकर मिसेज़ मदन के कमरे में भी नहीं जा सकता। वह शायद सोयी हुई हैं, शायद जग रही हैं, यदि वे दोनों एक साथ बैठते?
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जनाने जूते की आहट सुन सेठी ने घूमकर देखा, कोट की दोनों जेबों में हाथ डाले मिसेज़ मदन ने आकर कहा-- "धूप निकल आई है और छः घण्टे भी
हो गये अब तो हम चल सकते हैं?----क्या बजा होगा ?"

घड़ी अब तक बल्लू के ही पास थी और उसका शीशा और सुइयाँ टूट चुकी थीं। समय जानने का उपाय था केवल ड्राइवर से पूछना।

छः घण्टे जरूर बीत गये थे पर सड़क अभी ठीक न हो पाई थी और मोटरों को उस पार से गुज़रने की इजाजत न मिल सकती थी।

खानसामा ने फिर आकर सलाम किया और पूछा-- "लंच ( दोपहर का खाना) के लिये कुछ इन्तजाम होगा?"

"मेम साहब को पूछो।”—उत्तर देकर बालक की उँगली पकड़ सेठी धूप में निकल गया।

खानसामा अपने मन में क्या समझ रहा है, यह खयाल कर मिसेज मदन को मधुर संकोच हो रहा था। परन्तु उस संकोच को प्रकट करने से सुबह के व्यवहार और इस समय के संकोच से स्थिति और भी खराब हो जाती। मिसेज मदन ने कहा-- "जो कुछ भी हो देर न लगे।"

सेठी चाहता था मिसेज मदन के पास बैठना पर यदि मिसेज मदन को एतराज न हो। लंच खाने के लिये वे फिर साथ बैठे। बातचीत क्या हो? सेठी ने बताया कि पहाड़ों में सड़क टूट जाने का झगड़ा अक्सर रहता है। पिछली दफ़े वह सुबह आया था और तीन घण्टे में काम खत्म कर संध्या को लौट भी गया था। आप डलहौजी में कहाँ रहती हैं?"

मिसेज मदन ने अपना पता बता दिया और पूछा-- "आप कितने दिन ठहरेंगे?" सेठी आया था सिर्फ़ काम से। एक दिन, दो दिन तीन दिन ठहर सकता था। डलहौजी में चुड़ैल डण्डा पहाड़ी पर पल्टन के लिए नई इमारत बनायी जाएगी, उसी के ठेके की बाबत वह डलहौजी जा रहा था। पहले वह डलहौजी गया था तो “हिलक्रेस्ट" होटल में ठहरा था, अब भी वहीं ठहर जाएगा।

बात ही बात में मिसेज मदन ने अपनी कहानी सुनाई। पति सौ रुपये माहवार पाता है। स्वयं उसे भी स्कूल से साठ मिलता है। नौकरी के लिए मजदूरी है। उनका एक बँगला है जिसे पति की बीमारी के समय 4500 रुपये में रहन रख दिया था। उसका किराया सीजन में 200 - 250 रुपये आता है परन्तु उसका उन्हें कोई फ़ायदा नहीं, उल्टे 50-60 की किश्त उन्हें महाजन को और देनी पड़ती है।

सेठी ने सोचा 4500 क्या हैं परन्तु वह क्या कर सकता है? खाना खाते समय बल्लू के खेल को दोनों संतुष्ट आँखों से देख रहे थे। सेठी उसे खिलाते जाना चाहता था और मिसेज़ मदन उसे अधिक न खिलाने के लिए समझा रही थीं। उन्होंने बल्लू को सेठी की घड़ी तोड़ देने पर अफ़सोस भी प्रकट किया परन्तु सेठी ने सुनने से इन्कार कर दिया। खाना समाप्त हो ही गया। मिसेज़ मदन उठकर फिर भीतर जाना चाहती थीं, परन्तु सेठी ने साहस कर कहा-- "क्या फिर सो जाइयेगा?"

"नहीं तो, पर किया क्या जाए ? क्या शाम तक हम लोग किसी हालत में नहीं पहुँच सकते?”

"कोई उम्मीद नहीं। घबराती आप क्यों हैं? आप स्कूल कल न जाएंगी तो एक दिन की तनख्वाह कट जायगी दो रुपये! अगर मेरा काम न बना तो जानती हैं कितना नुकसान होगा---- साठ या पैंसठ हजार!" सेठी हँस पड़ा और कहता गया--"आप अपना मकान महाजन से छुड़वा क्यों नहीं लेती? फिर तो आपको नौकरी करने की जरूरत न रह जायेगी?"

"पर कैसे अभी तक हम मुश्किल से एक हज़ार भर पाये हैं।"

"उसमें क्या है, आप छुड़ा लीजिए, रुपया हो जाएगा। मुझे सूद नहीं चाहिए रुपये की भी ऐसी चिन्ता नहीं!"

मिसेज़ मदन की आँखें चमक उठीं, चेहरे पर लाली दौड़ गयी। अपने आपको सम्भालने के लिए उन्होंने बल्लू को गोद में खींच लिया और उसके हाथ से घड़ी छीनकर कहा-- "इसे आप रखिए नहीं तो इसे यह खो देगा।"

बल्लू के मुँह बनाने पर मिसेज मदन ने उँगली उठाकर कहा-- "चुप चुप, मामा जी मारेंगे।" यह एक शब्द मुख से कहकर मिसेज़ मदन ने सेठी पर अपना अधिकार प्रकट कर दिया। अब उन्होंने अपने पिता के घर की बात सुनानी शुरू कर दी और बता दिया कि उसका नाम है उर्मिला।

साथ-साथ बैठे संध्या आ गयी और फिर रात। आकाश में चाँद था। समीप खड़े चीड़ के वृक्षों से छन-छनकर चाँद की चांदनी उनपर पड़ रही थी। बल्लू भीतर सो गया था। उर्मिला सोच रही थी, यों एकान्त रात्रि में उन दोनों का एक साथ होना और चाँद का यों चमकना! भय और आतुरता की चिनगारियाँ उसके मस्तिष्क और त्वचा पर चिटक जातीं।

बाहर ठण्ड थी और ठण्डी हवा। भीतर जाने के लिए कमरे थे परन्तु खानसामा ने अपनी बुद्धि के अनुसार दोनों का सामान एक ही समझ कर दोनों बिस्तर एक ही कमरे में लगा दिये थे। ऐसा न करने के लिए उसे कहा भी न गया था परन्तु भीतर एक ही कमरे में पलंगों पर सो जाने की बात सोच कर मिसेज़ मदन की आँखें बन्द हो जाती। वह सोचती हट्ट ऐसा कैसे हो सकता है?

काफ़ी रात बीत गयी । सेठी ने कहा--"आपको सर्दी में कष्ट होगा, आप जाकर सोइये?"

"और आप?"

"मुझे नींद नहीं आ रही।" मिसेज़ मदन जानती थीं कि सेठी बाहर ही रात बिता देगा और उसी के कारण.....? ओफ़ कितना सज्जन आदमी है?

अपने रिश्ते में एक खूब पढ़ी-लिखी लड़की की बात बताकर मिसेज़ मदन ने कहा--"आप शादी कर लें।"

सेठी ने उत्तर दिया-– “जब आयु के धड़तालीस वर्ष ऐसे ही बीत गये तो शेष भी बीत हो जायेंगे और शादी; वह तो एक क़िस्म से दाव लगाना है, सीधा पड़ सकता है पर उल्टा भी !”

सेठी ने फिर एक दफ़ा उर्मिला को भीतर जाकर सो जाने के लिए कहा। उर्मिला ने उत्तर दिया-– उसे चाँदनी बहुत अच्छी मालूम हो रही है, सर्दी भी खास नहीं। कोई भी भीतर नहीं गया दोनों वहीं बैठे रहे। कभी सेठी कुछ कहता और उर्मिला सुनती, कभी उर्मिला कहती और सेठी सुनता।

नवमी का चाँद पहाड़ की ओट हो गया, समय जानने का कोई उपाय न था परन्तु आधी से अधिक रात बीत चुकी थी। जाड़े से दोनों काँप रहे थे। उर्मिला के लिए यह सह्य न था कि उसकी वजह से सेठी जाड़े में इस तरह मरे। हो सकता है कि वह बीमार ही हो जाए? खड़ी होकर उसने कहा--"आइये भीतर चलें, क्या घरों में सब लोग एक कमरे में नहीं सोते?" वे दोनों भीतर जा रहे थे, उस समय सेठी ने उर्मिला की पीठ पर हाथ रख दिया। अपने- अपने बिस्तर में कम्बल में लिपट कर वे दोनों लेट गये।

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सड़क सुबह ही खुल गयी थी परन्तु चाय पी लेने के बाद ही चलने का निश्चय हुआ। सेठी ने पूछा-- "रात खूब नींद आई ?” और हँस दिया। उर्मिला ने मुस्कराकर कहा--"आपको तो ज़रूर आई होगी?"

दोनों समझ गये कि नींद किसी को भी नहीं आई परन्तु उनींदी रात काट देने पर भी दोनों के शरीर में काफी स्फूर्ति थी।

सेठी ने कहा--"तबीयत नहीं होती इस बंगले को छोड़कर जाने की?" उर्मिला ने करुण दृष्टि से सेठी की तरफ देखा और आँखें झुका लीं। शब्द न थे। उसने पति पाया था परन्तु ऐसी उदारता, संयम और अनुराग न देखा था। उसका रोम-रोम पुकारना चाहता था-- तुम बड़े हो, महान् हो! परन्तु जिह्वा बन्द थी। स्त्री की हमेशा हार है। जब उस पर आक्रमण होता है तब भी और जब उसे पनाह दी जाती है तब भी।

चलने से पहले सेठी ने कहा--"अगर तुम्हें एतराज न हो तो मैं इस बंगले में तुम्हारा एक फोटो ले लेना चाहता हूँ।"

एतराज? उर्मिला को एतराज क्या हो सकता था? उसने केवल कृतज्ञता से सेठी की ओर देख भर लिया। उर्मिला गर्दन एक ओर झुकाकर खम्भे से टिककर खड़ी हो गई। सेठी ने कई फोटो खींचे ।

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दो मास केवल साठ दिन के होते हैं परन्तु इस बीच कितना परिवर्तन हो गया। मदन मिलिटरी अकाउण्टेण्ट के दफ्तर से एक सौ रुपये की नौकरी छोड़ कर 'सेठी एण्ड कम्पनी' में एकाउण्टेण्ट हो गया। उसे तीन सौ रुपया माहवार मिलने लगा। उर्मिला साठ रुपये की मास्टरनी नहीं रही। वह अपने छोटे से बँगले के सामने खूब बड़ी छतरी के नीचे गुलाबी धूप में बैठकर बल्लू को सड़क पर टहलाने ले जाती है।

सेठी का बार-बार डलहोजी आना ज़रूरी है; क्योंकि फौजी बेरकें बनाने का ठेका उसके पास है। उर्मिला के मन में दुविधा है कि सेठी उसकी रिश्ते की बहिन से शादी करने को तैयार क्यों नहीं होता?

उर्मिला सब कुछ समझ कर भी स्वीकार करना नहीं चाहती। पिछली दफ़े सेठी ने स्पष्ट कह दिया था-- "पेट भर कर कद्दू चबाने की अपेक्षा संतरे की सुगन्ध पा लेना ही अच्छा है।" स्वेटर बुनते-बुनते उसे ख्याल आया कि वह खुद ही संतरा है। एक-एक कर के सेठी के व्यवहार उसकी आँखों के सामने आने लगे। सेठी को उसका अपने बालों में उँगलियाँ चलाना बहुत अच्छा लगता है। बिना कुछ कहे वह उसे सामने बिठा रखना चाहता है। सेठी जो कपड़ा लाकर दे, वो उसे सेठी के सामने पहनना ही चाहिए। सेठी की किसी बात को अस्वीकार कर देना उसके लिए सम्भव नहीं। जब सेठी चाहे उसे बिना बाँह और बिना पीठ का ब्लाउज पहनना होगा। बेशक उर्मिला को भी वही कुछ पहनने, उसी तरह रहने से संतोष होता है जैसी सेठी की इच्छा होती है परन्तु उसका अपना अस्तित्व, अपना व्यक्तित्व कहाँ रह गया?

और फिर पिछले बुध की रात को जब सेठी आधी रात तक बंगले में ही रहा, उसने क्या बात कही?... उसने उसे हाथ नहीं लगाया, छुधा नहीं, दूर ही बैठा देखता रहा परन्तु फिर भी उसमें शेष रह ही क्या जाता है? उसने कहा था--"मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ, मेरे प्रेम का कोई उद्देश्य नहीं, तुम मुझे हृदय की चाह जैसी जान पड़ती हो! तुम्हें देखना चाहता हूँ---- अपना समझना चाहता हूँ?"

उर्मिला से यह न हो सका। वह रोने लगी थी। उस समय वह 'माफ करो' कहकर चुप-चाप चला गया।

आज सिलाइयों की बुनती में दृष्टि गड़ाये बिजली की तेज रोशनी में उस रात का सब दृश्य उसकी आँखों के सामने फिर गया। पर क्या रात उसने ठीक किया ?

जिस आदमी ने बिना एहसान जताये अपने जीवन भर के परिश्रम की कमाई इसे भेंट कर दी, अपने लिए कभी कुछ भी नहीं चाहा उसकी बात चाहे जो भी हो----- उसे निराश करना.....!

सेठी ने कह दिया था, वह अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति बल्लू को दे देगा परन्तु बल्लू का उस सम्पत्ति में कोई हिस्सेदार नहीं आ जाना चाहिये ! ....स्पष्ट शब्दों में इसका अर्थ था उर्मिला की कोख पर ताला लगाकर सेठी ने उस पर अपना अधिकार कर लिया, वह उसे छुये या न छुये! बल्लू भी उसी का है, मदन भी उसी का है और उर्मिला सब से पहिले उसकी ही है।

सेठी कितना संयमी, कितना उदार कितना विशाल हृदय है? ----सब कुछ उसने किस तरह दे दिया? -----उर्मिला ने तो कुछ भी सेठी को दिया नहीं----- देने का मौका ही नहीं आया। सेठी ने सब चीजों पर स्वप्न में ही अधिकार कर लिया और कितनी सरलता से? मानो सब चीजों की एक चाबी थी, जिसे उठाकर उसने अपनी जेब में रख लिया। उस जाल से बाहर होने का कोई रास्ता न उर्मिला के लिए, न बल्लू के लिए और न मदन के लिए ही है। मानो वे सब बिक गये हैं।

..और यदि सेठी कल फिर आये और उदास मुख से अपनी उसी बात को दोहराये? एक तरफ़ बैठकर कहे "तुम्हें चाहता हूँ" तो क्या वो अब भी 'न' कर सकेगी? एक बार 'न' कर वह अपराधी की तरह पछताई।

उर्मिला ने सोचा, उसमें बात ही क्या है? फिर भी वो एक दफ़े इनकार कर देना चाहती थी। परन्तु इनकार का हक़ है उसे ? वह हक़ जो सबको होता है, उसे न था, उसकी अपनी आत्मा के सम्मुख ही न था। ----वेश्याओं का जीवन और क्या होता है---- उर्मिला की आँखों से टप-टप आँसू गिरने लगे।

फिर ख्याल आया दो ही महीने पहिले, जब केवल छोटे-छोटे दो कमरे थे, उर्मिला थक कर स्कूल से लौटती थी और बच्चे को गोद में लेकर मूर्ख नौकर के साथ सिर खपाती थी। अनेक ज़रूरतें पूरी न हो पाती थीं। परन्तु उस समय वह 'हाँ' या 'ना' कह सकती थी। स्वयं अपनी इच्छा से वह चाहे जो भी करती------सिगरेट कम्पनी वाला वह हँसमुख बाबू कितना सज्जन था ? परन्तु उसने सदा उसे इनकार ही किया!

फिर ख्याल आया--हो सकता है, आज सेठी आवे। उसने आँसू भरी आँखें उठाकर फाटक की ओर देखा----उन में आतुरता नहीं कातरता थी...।

-यशपाल

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