अंग्रेजी के माया मोह से हमारा आत्मविश्वास ही नष्ट नहीं हुआ है, बल्कि हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान भी पददलित हुआ है। - लक्ष्मीनारायण सिंह 'सुधांशु'।

चलो चलें उस पार

चलो चलें उस पार | Hindi poem by Amarjit Kaur Kanwal

चलों चलें उस पार
झर झर करते झरने हों जहाँ
बहती हो नदिया की धारा
जीवन के चंद पल हों अपने
कर लें हम प्रकृति से प्यार

क्या रखा परदों के पीछे
चार दीवारी के चेहरे हैं
न प्रभात की लाली दिखती
न सिंदूरी साँझ के तार

सीमित और सँगीन महल ये
अंधेरी हर मन की नगरी
कैसी ये हिलजुल चिलमन की
थक गईं पलकें पँथ निहार

न समीर सुखदायक निर्मल
तन मन पीड़ित इस नगरी में
पतझड़ सा जीवन लगता है
न जाने कब आए बहार

साँझ की किरणें ले काली चादर
डगर डगर हर नगर गाँव में
सन्नाटे की मूक वाणी से
छा जातीं हर गली-द्वार

तरस रहे हैं अधीर ये नैनां
झिलमिल तारों की पाने को
चाँदी की चुनरी जो ओढ़े
करते कुदरत का सिंगार

जुआर भावों की चढ़ चढ़ उतरे
बिजली कौंधे, घन काले छाए
दमकें, खेलें आंख मिचौली
शायद कभी तो बरसे फुहार

वन उपवन सब धुल जाएंगे
महक बिखेरे हर फुलवाड़ी
पुष्पों के मुख मोती बन कर
चमकेंगे तब वे पल चार

लौटेंगी जब मुग्ध निगाहें
परदीली दुनिया के अन्दर
कौतूहल बस मन में होगी
फिर छाएगा वही अंधियार
चलो चलें उस पार

-अमरजीत कौर कंवल, फीजी

 

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