इस विशाल प्रदेश के हर भाग में शिक्षित-अशिक्षित, नागरिक और ग्रामीण सभी हिंदी को समझते हैं। - राहुल सांकृत्यायन।
स्नेह-निर्झर बह गया है | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (काव्य)    Print this  
Author:सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'

स्नेह-निर्झर बह गया है
रेत ज्यों तन रह गया है।

आम की यह डाल जो सूखी दिखी,
कह रही है--अब यहाँ पिक या शिखी,
नहीं आते; पंक्ति मैं वह हूँ लिखी
नहीं जिसका अर्थ--
जीवन दह गया है।

दिये हैं मैने जगत को फूल-फल,
किया है अपनी प्रतिभा से चकित-चल,
पर अनश्वर था सकल पल्लवित पल,
ठाट जीवन का वही--
जो ढह गया है।

अब नहीं आती पुलिन पर प्रियतमा,
श्याम तृण पर बैठने को निरुपमा।
बह रही है हृदय पर केवल अमा,
मै अलक्षित हूँ, यही
कवि कह गया है।

-निराला

 

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