मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह मैं नहीं सह सकता। - विनोबा भावे।

आओ फिर से दीया जलाएं | कविता

आओ फिर से दीया जलाएं | अटल बिहारी वाजपेयी की कविता | Poem by Atal Bihari Vajpayee

आओ फिर से दिया जलाएं
भरी दूपहरी में अधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़े
बुझी हुई बाती सुलगाएं
आओ कि से दीया जलाएं।

हम पड़ाव को समझे मंजिल
लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल
वर्तमान के मोहजाल में
आने वाला कल न भुलाएँ
आओ कि से दीया जलाएं।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज्र बनाने
नव दधीचि हड्डियां गलाए
आओ कि से दीया जलाएं।

- अटल बिहारी वाजपेयी

 

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