यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? - चंद्रशेखर मिश्र।
मंदिर-दीप (काव्य)    Print this  
Author:सोहनलाल द्विवेदी | Sohanlal Dwivedi

मैं मंदिर का दीप तुम्हारा।
जैसे चाहो, इसे जलाओ,
जैसे चाहो, इसे बुझायो,

इसमें क्या अधिकार हमारा?
मैं मंदिर का दीप तुम्हारा।

जस करेगा, ज्योति करेगा,
जीवन-पथ का तिमिर हरेगा,

होगा पथ का एक सहारा!
मैं मंदिर का दीप तुम्हारा।

बिना स्नेह यह जल न सकेगा,
अधिक दिवस यह चल न सकेगा,

भरे रहो इसमें मधुधारा,
मैं मंदिर का दीप तुम्हारा।

- सोहनलाल द्विवेदी

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