हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना
झरे हों फूल गर पहले | ग़ज़ल  (काव्य)    Print this  
Author:भावना कुँअर | ऑस्ट्रेलिया

झरे हों फूल गर पहले, तो फिर से झर नहीं सकते
मुहब्बत डालियों से फिर, कभी वो कर नहीं सकते

कड़ी हो धूप सर पर तो, परिंदे हाँफ जाते हैं
तपी धरती पे भी वो पाँव, अपने धर नहीं सकते

भरा हो आँसुओं से गर, कहीं भी आग का दरिया
बनाकर मोम की कश्ती, कभी तुम तर नहीं सकते

भले ही प्यार की मेरी, वो छोटी सी कहानी हो
लिखो सदियों तलक चाहे, ये पन्ने भर नहीं सकते

उड़ाने हों अगर लम्बी, तो दम फिर हौंसलों में हो
भले तूफाँ कई आयें, कतर वो पर नहीं सकते

इरादे हों अगर पक्के, तो मत डर देखने से तू
बड़े कितने भी सपने हों, कभी वो मर नहीं सकते

-डॉ० भावना कुँअर
 सिडनी (ऑस्ट्रेलिया)

Previous Page  |  Index Page  |   Next Page
 
Post Comment
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश