हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी
बीता मेरे साथ जो अब तक | ग़ज़ल  (काव्य)    Print this  
Author:भावना कुँअर | ऑस्ट्रेलिया

बीता मेरे साथ जो अब तक, वो बतलाने आई हूँ
जीवन के इस उलझेपन को मैं सुलझाने आई हूँ

पाया जिससे जैसा भी था, मैंने अपने जीवन में
प्यार का बनकर मैं सौदागर, वो लौटाने आई हूँ

सागर मुझसे पूछ रहा है, नाव मेरी क्यूँ डोल रही
मैं तो लहरों की सरगम पर, ताल लगाने आई हूँ

जख्मीं होकर तूफानों से, यहाँ वहाँ मैं गिरती हूँ
सपनों के नभ पर पंखों को, मैं फैलाने आई हूँ

सीढ़ी मैंने चढ़नी चाही, लोग गिराते नहीं थके
खुद से खुद की बन बैसाखी पाँव जमाने आई हूँ

जीवन की इस भागदौड़ में, जो जो सपने टूट रहे
जादू की सी छड़ी घुमाकर, सच करवाने आई हूँ

धूल की चादर के नीचे जो, मीठी यादें सोईं थीं
बना एलबम उन यादों की, आज जगाने आई हूँ

पा सकते हो सारी खुशियाँ, अगर इरादे पक्के हों
लेकर अपने कलम की ताकत, ये समझाने आई हूँ

-डॉ० भावना कुँअर
 सिडनी (ऑस्ट्रेलिया)

Previous Page  |  Index Page  |   Next Page
 
Post Comment
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश