यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? - चंद्रशेखर मिश्र।
दे, मैं करूँ वरण (काव्य)    Print this  
Author:सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'


दे, मैं करूँ वरण
जननि, दुःखहरण पद-राग-रंजित मरण ।

भीरुता के बँधे पाश सब छिन्न हों;
मार्ग के रोध विश्वास से भिन्न हों,
आज्ञा, जननि, दिवस-निशि करूँ अनुसरण ।
लांछना इंधन, हृदय-तल जले अनल,
भक्ति-नत-नयन मैं चलूँ अविरत सबल
पारकर जीवन-प्रलोभन समुपकरण ।

प्राण-संघान के सिन्धु के तीर मैं,
गिनता रहूँगा न, कितने तरंग हैं,
धीर मैं ज्यों समीरण करूँगा तरण ।

- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
[ वीणा मासिक, जून 1935 ]

 

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