राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है। - बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'
माँ | ग़ज़ल (काव्य)    Print this  
Author:निदा फ़ाज़ली

बेसन की सोंधी रोटी पर, खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चौका, बासन, चिमटा, फूंकनी जैसी माँ

बांस की खुर्री खाट के ऊपर, हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी, थकी दोपहरी जैसी माँ

चिड़ियों के चहकार में गूंजे, राधा - मोहन अली-अली
मुर्गी की आवाज़ से खुलती, घर की कुण्डी जैसी माँ

बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन, थोड़ी -थोड़ी सब में
दिन भर इक रस्सी के ऊपर, चलती नटनी जैसी माँ

बाँट के अपना चेहरा, माथा, आँखें, जाने कहाँ गई
फटे पुराने इक एलबम, में चंचल लड़की जैसी माँ

- निदा फ़ाज़ली

 

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