हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना
कटी पतंग (काव्य)    Print this  
Author:डॉ मृदुल कीर्ति

एक पतंग नीले आकाश में उड़ती हुई,
मेरे कमरे के ठीक सामने
खिड़की से दिखता एक पेड़,
अचानक पतंग कट कर
वहाँ अटक गयी।

नीचे कितने ही लूटने वाले आ गए
क्योंकि--
पतंग की किस्मत है
कभी कट जाना
कभी लुट जाना
कभी उलझ जाना
कभी नुच जाना
कभी बच जाना
कभी छिन जाना
कभी सूखी टहनियों
पर लटक जाना।

टूट कर गिरी तो झपट कर
तार-तार कर देना।
हर हाल में लालची निगाहें
मेरा पीछा करती है।

कहीं मैं नारी तो नहीं?

-डॉ मृदुल कीर्ति
 ऑस्ट्रेलिया

Previous Page  |   Next Page
 
Post Comment
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश