अकबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों ने जिस देशभाषा का स्वागत किया वह ब्रजभाषा थी, न कि उर्दू। -रामचंद्र शुक्ल

काव्य

जब ह्रदय अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे काव्य कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक संबंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं। ये परिभाषाएं आधुनिक हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। काव्य में सत्यं शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना जाता है।

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हमने अपने हाथों में - उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans

हमने अपने हाथों में जब धनुष सँभाला है,
बाँध कर के सागर को रास्ता निकाला है।

 
कटी पतंग - डॉ मृदुल कीर्ति

एक पतंग नीले आकाश में उड़ती हुई,
मेरे कमरे के ठीक सामने
खिड़की से दिखता एक पेड़,
अचानक पतंग कट कर
वहाँ अटक गयी।

 
यूँ तो मिलना-जुलना  - प्रगीत कुँअर | ऑस्ट्रेलिया

यूँ तो मिलना-जुलना चलता रहता है
मिलकर उनका जाना खलता रहता है

 
दूर गगन पर | गीत  - अनिता बरार | ऑस्ट्रेलिया

दूर गगन पर सँध्या की लाली
सतरंगी सपनों की चुनरी लहरायी
आँचल में भरकर तुझे ओ चंदा
चाँदनी बनकर मैं मुस्करायी
दूर गगन पर----

 
त्रिलोक सिंह ठकुरेला की कुण्डलिया  - त्रिलोक सिंह ठकुरेला

कुण्डलिया 

 
हिंद को सलाम करें, शान के  लिये - आशीष मिश्रा | इंग्लैंड

तीन रंग से बना है, ध्वज यहाँ खड़ा
                शौर्य और शूरता से भव्य है बड़ा
और जिसे देखकर वीर कह उठा
              सलाम हिंद केसरी, श्वेत और हरा
आरती और अर्चना, सम्मान के लिये
देश की आराधना और मान के लिये
हिंद को सलाम करें, शान  के  लिये
 
रात बीत ही गयी है, ये सुबह हुई
                आज जीत ही बिछी है, देख तो सही
आज दिन नये को देखो तौलता आकाश
                 रात है गयी धरा से बोलता आकाश
राष्ट्र की है भावना, अभिमान के लिये
देश की आराधना और मान के लिये
हिंद को सलाम करें, शान  के  लिये
 
आज़ाद का गगन है ये सुखदेव की धरा
                 और भगत सिंह से है कौन सा बड़ा
लाख अत्याचार से ये कोई ना झुका
                 गांधी के हर सत्य में है राम ही छुपा
मुक्त हों हर वेदना से, प्राण दे दिये
देश की आराधना और मान के लिये
हिंद को सलाम करें, शान  के  लिये
 
सच में ये धरा मेरे किसान की भूमि
                 खेत ये खलिहान बलिदान की भूमि
क़लाम के प्रयोग और विज्ञान की भूमि
            जय हिंद जय जवान के आह्वान की भूमि
 
जम्मू काशमीर और अंडमान की भूमि
                शिलोंग, मिज़ोरम, राजस्थान की भूमि
राणा और शिवाजी के अटल आन की भूमि
                 वीरों के पानीपत की है मैदान की भूमि
 
सरहदों पे जागते जवान की भूमि
                 आरती में शंख और अजान की भूमि
बुद्ध की पदचाप और ध्यान की भूमि
                  कबीर के दोहो से भरे ज्ञान की भूमि
 
तुलसी ने करी साधना, जिस काम के लिये
                  ये भूमि मेरी वंदना, उस राम के लिये
देश की आराधना और मान के लिये
                 हिंद को सलाम करें, शान  के  लिये।

 
सो गई है मनुजता की संवेदना - डॉ. जगदीश व्योम

सो गई है मनुजता की संवेदना
गीत के रूप में भैरवी गाइए
गा न पाओ अगर जागरण के लिए
कारवाँ छोड़कर अपने घर जाइए

 
मैं जिसे ओढ़ता -बिछाता हूँ | दुष्यंत कुमार  - दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar

मैं जिसे ओढ़ता -बिछाता हूँ
वो गज़ल आपको सुनाता हूँ।

 
मेरे दुख की कोई दवा न करो  | ग़ज़ल - सुदर्शन फ़ाकिर

मेरे दुख की कोई दवा न करो 
मुझ को मुझ से अभी जुदा न करो 

 
दो-चार बार... | ग़ज़ल - कुँअर बेचैन

दो-चार बार हम जो कभी हँस-हँसा लिए
सारे जहाँ ने हाथ में पत्थर उठा लिए

 
कला कौ अंग | दोहे - प्रो. राजेश कुमार

लेखक का गुण एक ही करै भँडौती धाय।
पुरस्कार पै हो नज़र ग्रांट कहीं मिल जाय॥

 
एक पगले नास्तिक की प्रार्थना  - राजेश्वर वशिष्ठ

मुझे क्षमा करना ईश्वर
मुझे नहीं मालूम कि तुम हो या नहीं
कितने ही धर्मग्रंथों में
कितनी ही आकृतियों और वेशभूषाओं में
नज़र आते हो तुम
यहाँ तक कि कुछ का कहना है
नहीं है तुम्हारा शरीर

 
साल मुबारक!  - अमृता प्रीतम

जैसे सोच की कंघी में से
एक दंदा टूट गया
जैसे समझ के कुर्ते का
एक चीथड़ा उड़ गया
जैसे आस्था की आँखों में
एक तिनका चुभ गया
नींद ने जैसे अपने हाथों में
सपने का जलता कोयला पकड़ लिया
नया साल कुझ ऐसे आया…

 
जो दीप बुझ गए हैं - दुष्यंत कुमार

जो दीप बुझ गए हैं
उनका दु:ख सहना क्या,
जो दीप, जलाओगे तुम
उनका कहना क्या,

 
क्या कहें ज़िंदगी का फ़साना मियाँ | ग़ज़ल - डॉ. शम्भुनाथ तिवारी

क्या कहें ज़िंदगी का फ़साना मियाँ
कब हुआ है किसी का ज़माना मियाँ

 
गए साल की - केदारनाथ अग्रवाल

गए साल की
ठिठकी ठिठकी ठिठुरन
नए साल के
नए सूर्य ने तोड़ी।

 
पीर  - डॉ सुधेश

हड्डियों में बस गई है पीर।

 
अब तो मजहब कोई | नीरज के गीत  - गोपालदास ‘नीरज’

अब तो मजहब कोई, ऐसा भी चलाया जाए
जिसमें इनसान को, इनसान बनाया जाए

 
नया वर्ष - डॉ० राणा प्रताप गन्नौरी राणा

नया वर्ष आया नया वर्ष आया,
नया हर्ष लाया नया हर्ष लाया ।

 
मैं करती हूँ चुमौना  - अलका सिन्हा

कोहरे की ओढ़नी से झांकती है
संकुचित-सी वर्ष की पहली सुबह यह
स्वप्न और संकल्प भर कर अंजुरी में
इस उनींदी भोर का स्वागत,
मैं करती हूँ चुमौना।
 
इस बरस के ख्वाब हों पूरे सभी
बदनजर इनको न लग जाए कभी
दोपहर की धूप में काजल मिलाकर
मैं लगाती हूँ सुनहरे साल के
गाल पर काला डिठौना।
 
फिर वही बच्चों की मोहक टोलियां हों
बाग में रूठें, मनाएं, जोड़ियां हों
पंछियों के साथ मिलकर चहचहाए
राह देखे शाम लेकर
घास का कोमल बिछौना।
 
गत बरस तो बीत घूंघट में गया
इस बरस का चांद दूल्हे-सा सजा
ले कुंआरे स्वप्न गर्वीला खड़ा है
प्रेम से मनमत्त है आतुर, करा लाने को गौना।

 
डॉ सुधेश के दोहे - डॉ सुधेश

हिन्दी हिन्दी कर रहे 'या-या' करते यार। 
अंगरेजी में बोलते जहां विदेशी चार॥

 
कोरोना पर दोहे  - डॉ रामनिवास मानव | Dr Ramniwas Manav

गली-मुहल्ले चुप सभी, घर-दरवाजे बन्द।
कोरोना का भूत ही, घुम रहा स्वच्छन्द॥

 
मतदान आने वाले ,सरगर्मियाँ बढ़ीं | ग़ज़ल - संजय तन्हा

मतदान आने वाले, सरगर्मियाँ बढ़ीं।
झाँसे में हमको लेने फ़िर कुर्सियाँ बढ़ीं।।

 
उपस्थिति - जयप्रकाश मानस | Jaiprakash Manas

व्याकरणाचार्यों से दीक्षा लेकर नहीं 
कोशकारों के चेले बनकर भी नहीं 
इतिहास से भीख माँगकर तो कतई नहीं

 
संदेश  - रोहित कुमार 'हैप्पी' | न्यूज़ीलैंड

मुझे याद है वह संदेश -
'बुरा न सुनो, बुरा न कहो, बुरा न देखो!'

 
हंसों के वंशज | गीत - राजगोपाल सिंह

हंसों के वंशज हैं लेकिन
कव्वों की कर रहे ग़ुलामी
यूँ अनमोल लम्हों की प्रतिदिन
होती देख रहे नीलामी
दर्पण जैसे निर्मल मन को
क्यों पत्थर के नाम कर दिया

 
जय जय जय अंग्रेजी रानी! - डॉ. रामप्रसाद मिश्र

जय जय जय अंग्रेजी रानी!
‘इंडिया दैट इज भारत' की भाषाएं भरतीं पानी ।
सेवारत हैं पिल्ले, मेनन, अयंगार, मिगलानी
तमिलनाडु से नागालैंड तक ने सेवा की ठानी।
तेरे भक्तों को हिंदी में मिलती नहीं रवानी
शब्दों की भिक्षा ले ले उर्दू ने कीर्ति बखानी।
एंग्लो-इंडियन भाई कहते, तू भारत की वाणी
अड़गम- बड़गम-कड़गम कहते, तू महान् कल्याणी।
अंकल,आंटी, मम्मी, डैडी तक है व्यापक कहानी
पब्लिक स्कूलों से संसद तक तूने महिमा तानी।
अंग्रेजी में गाली देने तक में ठसक बढ़ानी
फिर भाषण में क्यों न लगे सब भक्तों को सिम्फानी ।
मैनर से बैनर, पिओन से लीडर तक लासानी
सभी दंडवत करते तुझको, तू समृद्धि-सुख-दानी।
जय जय जय अंग्रेजी रानी!
जय जय जय अंग्रेजी रानी!!

 
हुल्लड़ के दोहे  - हुल्लड़ मुरादाबादी

बुरे वक्त का इसलिए, हरगिज बुरा न मान। 
यही तो करवा गया, अपनों की पहचान॥ 

 
मसख़रा मशहूर है... | हज़ल - हुल्लड़ मुरादाबादी

मसख़रा मशहूर है आँसू बहाने के लिए
बांटता है वो हँसी सारे ज़माने के लिए

 
मुझको सरकार बनाने दो - अल्हड़ बीकानेरी

जो बुढ्ढे खूसट नेता हैं, उनको खड्डे में जाने दो
बस एक बार, बस एक बार मुझको सरकार बनाने दो।

 
कंकड चुनचुन  - कबीरदास | Kabirdas

कंकड चुनचुन महल उठाया
        लोग कहें घर मेरा। 
ना घर मेरा ना घर तेरा
        चिड़िया रैन बसेरा है॥

 
सामने आईने के जाओगे - डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा'

सामने आईने के जाओगे?
इतनी हिम्मत कहां से लाओगे?

 
जड़ें - ममता मिश्रा 

जड़ों में गढ़ के पड़े रहने से 
नवांकुर नहीं फूटते 
जैसे जागने पर स्वप्न नहीं टूटते 
वह तो टूटा करते हैं 
सोने से !

 
इस महामारी में  - डॉ मनीष कुमार मिश्रा

इस महामारी में
घर की चार दिवारी में कैद होकर
जीने की अदम्य लालसा के साथ
मैं अभी तक जिंदा हूँ 
और देख रहा हूँ
मौत के आंकड़ों का सच 
सबसे तेज़
सबसे पहले की गारंटी के साथ।

 
बकरी  - हलीम आईना

आदर्शों के 
मेमनों की
बलि

 
हे कविता - मनीषा खटाटे

हे कविता!
हर रात सोते समय,
एक कविता को 
सपने में आने के लिये प्रार्थना करती हूँ। 

 
वो बचा रहा है गिरा के जो - निज़ाम-फतेहपुरी

वो बचा रहा है गिरा के जो, वो अज़ीज़ है या रक़ीब है
न समझ सका उसे आज तक, कि वो कौन है जो अजीब है

 
ज़हन में गर्द जमी है--- - ज़फ़रुद्दीन ज़फ़र

तुम बहुत सो चुके हो जगिए भी तो सही,
ज़िंदा हो अगर ज़िंदा लगिए भी तो सही।

 
भला करके बुरा बनते रहे हम - डॉ राजीव कुमार सिंह

भला करके बुरा बनते रहे हम
मगर इस राह पर चलते रहे हम

 
नया साल : नया गीत - विनिता तिवारी

नये साल में गीत लिखें
कुछ नये भाव के  ऐसे
हर शाखा पर पत्र-पुष्प नव 
ऋतु बसंत में  जैसे

 

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