अकबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों ने जिस देशभाषा का स्वागत किया वह ब्रजभाषा थी, न कि उर्दू। -रामचंद्र शुक्ल

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हिंदी और राष्ट्रीय एकता - सुभाषचन्द्र बोस

यह काम बड़ा दूरदर्शितापूर्ण है और इसका परिणाम बहुत दूर आगे चल कर निकलेगा। प्रांतीय ईर्ष्या-द्वेश को दूर करने में जितनी सहायता हमें हिंदी-प्रचार से मिलेगी, उतनी दूसरी किसी चीज़ से नहीं मिल सकती। अपनी प्रांतीय भाषाओं की भरपूर उन्नति कीजिए। उसमें कोई बाधा नहीं डालना चाहता और न हम किसी की बाधा को सहन ही कर सकते हैं; पर सारे प्रांतो की सार्वजनिक भाषा का पद हिंदी या हिंदुस्तानी ही को मिला। नेहरू-रिपोर्ट में भी इसी की सिफारिश की गई है। यदि हम लोगों ने तन मन से प्रयत्न किया, तो वह दिन दूर नहीं है, जब भारत स्वाधीन होगा और उसकी राष्ट्रभाषा होगी हिंदी।

 
न्यूज़ीलैंड की हिंदी पत्रकारिता | FAQ  - रोहित कुमार 'हैप्पी' | न्यूज़ीलैंड

न्यूज़ीलैंड हिंदी पत्रकारिता - बारम्बार पूछे  जाने वाले प्रश्न | FAQ 

 
अटल जी का ऐतिहासिक भाषण  - भारत-दर्शन संकलन

स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी का हिंदी प्रेम सर्वविदित है।

 
परदेश और अपने घर-आंगन में हिंदी - बृजेन्द्र श्रीवास्तव ‘उत्कर्ष’

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, "भारत के युवक और युवतियां अंग्रेजी और दुनिया की दूसरी भाषाएँ खूब पढ़ें मगर मैं हरगिज यह नहीं चाहूंगा कि कोई भी हिन्दुस्तानी अपनी मातृभाषा को भूल जाएँ या उसकी उपेक्षा करे या उसे देखकर शरमाये अथवा यह महसूस करे कि अपनी मातृभाषा के जरिए वह ऊँचे से ऊँचा चिन्तन नहीं कर सकता।" वास्तव में आज उदार हृदय से, गांधी जी के इस विचार पर चिंतन-मनन करने की आवश्यकता है। हिंदी भाषा, कुछ व्यक्तियों के मन के भावों को व्यक्त करने का माध्यम ही नहीं है बल्कि यह भारतीय संस्कृति, सभ्यता, अस्मिता, एकता-अखंडता, प्रेम-स्नेह-भक्ति और भारतीय जनमानस को अभिव्यक्त करने की भाषा है। हिंदी भाषा के अनेक शब्द वस्तुबोधक, विचार बोधक तथा भावबोधक हैं ये शब्द संस्कृति के भौतिक, वैचारिक तथा दार्शनिक-आध्यात्मिक तत्वों का परिचय देते हैं । इसीलिए कहा गया है- "भारत की आत्मा को अगर जानना है तो हिंदी सीखना अनिवार्य है ।"

 
अनेक नामों वाला पर्व मकर संक्रांति  - गोवर्धन दास बिन्नाणी

आप लोगों में से अधिक लोग जानते होंगे कि 14 जनवरी को मनाया जानेवाला मकर संक्रांति ( कभी-कभी यह एक दिन पहले या बाद में भी मनाया जाता है) एक ऐसा त्योहार है जो भारत के विभिन्न प्रान्तों में, विभिन्न रूपों में, अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है यानी किसी भी अन्य पर्व में  इतने अधिक रूप प्रचलित नहीं हैं जितने इस त्योहार को मनाने के हैं। सभी प्रान्तों में मकर संक्रांति वाले दिन उस जगह प्रचलित धार्मिक क्रियाकलाप जैसे जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तपर्ण वगैरह ही होता है । कहीं कहीं लोग पतंग भी उड़ाते हैं।

 

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