देश तथा जाति का उपकार उसके बालक तभी कर सकते हैं, जब उन्हें उनकी भाषा द्वारा शिक्षा मिली हो। - पं. गिरधर शर्मा।

'अंतहीन' जीवन जीने की कला (विविध)

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Author: डॉ. सुधांशु कुमार शुक्ला

डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक के कहानी संग्रह अंतहीन को 12 अविस्मरणीय कहानियों का दस्तावेज़ कहना ठीक है, इससे भी अधिक यदि यह कहा जाए कि यह कहानी संग्रह सांस्कृतिक-बोध और मानवीय-रिश्तों की अद्भुत गाथा है, तो अधिक सटीक होगा। कहानीकार का कवि मन कहानी के साथ-साथ भाषाई-सौंदर्यबोध, उत्तराखंड के सुरम्य प्राकृतिक सुषमा को चित्रित करता चला जाता है। यही कारण है कि वाह! जिंदगी कहानी संग्रह पर चर्चा होने के तुरंत बाद बेचैन कंडियाल जी के द्वारा उपलब्ध कराई गई। इस कहानी संग्रह पर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरा पर डॉ. विनय पाठक और श्री बी. एल. गौड़ जैसे संतों के समक्ष साहित्य की मंदाकिनी की कल-कल ध्वनि की गूँज न केवल छत्तीसगढ़ के विश्वविद्यालयों में गूँजी अपितु इसका नाद सौंदर्य भारत की सीमा को बेधता हुआ, विदेशी विश्वविद्यालयों को भी आनंदित कर गया।

अंतहीन नामकरण की सार्थकता को सिद्ध करती हुई ये कहानियाँ पाठक मन को सोचने समझने को प्रेरित करती हुई, अनेक प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए बाध्य करती हैं। यही कारण है कि इनकी कहानियाँ और इनके पात्र देशकाल की सीमाओं से परे सार्वभौमिक, सार्वदेशीय बन जाते हैं। साधारणीकरण की यह प्रक्रिया सुखद अनुभूति देती है।

अतीत की परछाइयाँ कहानी मात्र माता-पिता से बिछुड़े सरजू की कहानी नहीं है, अपितु यह कहानी भागीरथी और रामरथ के एकमात्र पुत्र को विदेशी दंपत्ति को बेचे जाने की दर्द भरी कहानी है। कहानीकार ने जहाँ उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में भटकते लालची लोगों द्वारा बच्चों को उठाकर विदेशियों को बेचने की समस्या को चित्रित किया है। वहीं अपने बेटे की याद में जीवन काटने पर अचानक नीदरलैंड से आए विदेशियों के झुंड में एक बालक को देखकर हू-बहू अपने बेटे का चेहरा देखकर रामरथ व्याकुल हो उठता है। जब वह पूरी घटना पत्नी को बताता है तो वह भी व्याकुल हो उठती है। युवकों का दल वापस लौटकर आयेगा, इस बात को ध्यान में रखकर भागीरथी का मातृहृदय विकल हो उठता है, माँ की ममता पुत्र से मिलने के लिए बेचैन हो उठती है, सुख के मारे अंतः चेतना जागृत हो जाती है, मृतप्राय में मानों एक बार फिर प्राण संचार हो गया हो ऐसा लगने लगता है। प्रातः से शाम तक चाय की दुकान पर उससे मिलने की आशा में बैठती है। एक दिन आ जाने पर और पूछने पर किस देश से आए हो अपने बेटे को पहचानने-जानने पर भी अपनी ममता को दबाकर वह शब्दहीन हो जाती है। वह सोचती है कि अगर वह यहाँ होता तो चाय की दुकान पर ही बैठता। उसका बेटा जिंदा है, खुश है यही भागीरथी और रामरथ की खुशी, महिमा है। भागीरथी और रामरथ नाम के पात्र उस मर्मस्पर्शी ममत्व की कुर्बानी की याद दिलाते हैं, जिन्होंने मानवता के हित में ही काम किया। भागीरथी और रामरथ भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं। भागीरथी गंगा की पावनता को धारण किए हुए बच्चे के लिए अपना सर्वस्व कुर्बान करने के लिए तैयार है। रामरथ भी पिता के पितृत्व को धारण किए हुए है।

अनजान रिश्ता कहानी वास्तव में ससुर-बहू के अनोखे रिश्ते की दास्तान है। मेरे जीवन की यह बेमिसाल कहानी है, जहाँ बहू सुलक्षणा दीनानाथ के बेटे से शादी करना चाहती थी, शादी से ठीक पहले ही अनुपम की मृत्यु हो जाने पर अनुपम के पिता दीनानाथ को अपने पिता के रूप में मानकर, अपनी पूरी जिंदगी उनकी सेवा में लगा देती है। यह मानवता की एक अद्भुत मिसाल है। यह कहानी अंतहीन चिंतन-मनन करने और स्वयं को देखने परखने को मजबूर करती है। जहाँ बेटे और बहू वृद्धों को वृद्धाश्रम छोड़ रहे हैं, उनका बुढ़ापा नरक बना रहे हैं। स्त्री विमर्श, वृद्ध विमर्श से भी ऊपर भारतीय संस्कृति में मानवता की विशद् व्याख्या है, जो आज अत्यंत आवश्यक एवं प्रासंगिक है, उसे लाने का प्रयास, उसकी बेचैनी साहित्यकार के साहित्य और आचरण में दिखलाई पड़ती है। यह कहानी विकलांग व्हीलचेयर पर बैठे ससुर की सबलता को दर्शाती है। उनकी मानवतावादी दृष्टिकोण, उनकी दूरदर्शिता को दर्शाती है।

संपत्ति कहानी में नालायक पुत्र की नालायकी और भू-माफिया की चालबाज़ी देखने को मिलती है। कहानीकार अगर कहानी को यहीं तक दिखाता तो कहानी सामान्य बन कर रह जाती। कहानीकार का उद्देश्य तो पति-पत्नी के झगड़ों से पुत्र की बर्बादी का रास्ता दिखाना मात्र भी नहीं है। अपने पुत्र के लिए रिटायरमेंट के बाद भी जमा पूँजी लगा देने वाला प्रशांत संबंधों की एक नई पकड़, एक नई राह में बंधकर सुमंगला नामक नारी के नारीत्व और प्यार को भी दिखाना चाहता है। शायद विवाह के बंधन में ना बंधकर भी एक साथ रहने वाली सुमंगला को प्रशांत का बेटा घर से निकाल देता है। सुमंगला को ढूँढते हुए प्रॉपर्टी अधिकारी जब वृद्धाश्रम पहुँचते हैं, तब सुमंगला कहती है, 'वो प्रशांत का बेटा है और प्रशांत मेरे लिए सब कुछ था। जो कुछ प्रशांत ने मुझे दिया वह मेरे लिए अमृत के समान है। उसी अमृत के प्रभाव और उनके साथ बिताये समय के सहारे मैं अपना शेष जीवन गुजार लूँगी। प्रशांत की हर चीज मेरी अपनी है, इसलिए बेटा और बहू भी मेरे अपने हैं। अपनों को कुछ देकर बहुत संतोष मिलता है बेटा।' (पृष्ठ-33) संपत्ति प्रशांत के नाम हो गई। भारतीय समाज में नारीत्व की पराकाष्ठा को दर्शाती यह कहानी आज के समय में और भी अधिक उपयोगी लगती है। जैसा नाम वैसा गुण, सुमंगला अर्थात् सु+मंगल की कामना धारण करने वाली सावित्री, सीता जैसी नारियों के देश को गौरवान्वित करती है।

अंतहीन कहानी गरीबी, मजबूरी, लाचारी की विशद् गाथा है। ना जाने कितने वर्षों से दूसरों के घरों में काम करके जीविका चलाने वाली पावन महिलाओं के अथक परिश्रम और यातना का दस्तावेज़ है यह कहानी। गरीबी, मजबूरी की मार के साथ-साथ लुभायाराम जैसे पति पाकर झुमकी की माँ जैसी औरतों को शराब के नशे में मार-पीट की यातना भी झेलनी पड़ती है। इस वर्ग की विकट जिजीविषा और संघर्षरत नारी का प्रतिनिधित्व करती झुमकी को इस कहानी की नायिका या केंद्रित पात्र कहा जा सकता है। कीचड़ में कमल की तरह खिली झुमकी को घर की परिस्थिति के कारण विद्यालय देखने का मौका तक ना मिला।

लाला सुखराम गरीबों को ब्याज पर उधार पैसा देता और सामान भी उधार देता। जो केवल अपना स्वार्थ खोजता है। लालची प्रवृत्ति का यह इंसान झुमकी जैसी लड़कियों को आपना शिकार बनाता है। यह कहानी अनमेल विवाह, ऋण की समस्या, दहेज प्रथा, नारी शोषण, रिश्तों की अमानवीयता, कामुक पुरूष की लालसा को दर्शाती है। साथ ही साथ गरीब महिलाओं की जिजीविषा को भी दर्शाती है। कहानीकार ने सैकड़ों वर्षो से चली आ रही मजबूरी में किए गए विवाह को संस्कार न मानकर शोषण-यातना की जीती जागती फिल्म के रूप में चित्रित किया। इस कहानी को पढ़कर रोटी, कपड़ा और मकान फिल्म याद आती है।

रमेश जी की कहानियाँ मानवतावादी सोच को दर्शाती है। इनकी अन्य कहानियाँ बदल गई जिंदगी, गेहूँ के दाने, कैसे सम्बन्ध, कतरा कतरा मौत, दहलीज, फिर जिंदा कैसे, रामकली, एक थी जूही सभी सराहनीय और पठनीय है। कहानी की विशेषता का प्रथम गुण जिज्ञासा, निरंतरता होता है। जिज्ञासा के कारण नीरसता कहीं भी नहीं आती है। अंत भी कथानक की चरम सीमा पर होता है। पाठक चिंतन मनन करता है। इनकी कहानियों में चित्रात्मकता और सौंदर्यबोध का प्रभाव देखने को मिलता है।

कहानियाँ पहाड़ी परिवेश के लोकतत्व को उजागर करती हैं। खासतौर पर पौड़ी गढ़वाल का परिवेश है। जहाँ उमड़ती नदियों का वेग, साँप की भाँति लहराती पहाड़ी सड़कें और ग्रामीण समाज में संतों का प्रभाव देखने को मिलता है। नारी को शोभायमान करने-मानने वाले कहानीकार ने अपनी संस्कृति का प्रमाण नारी पात्रों के नाम से व्यक्त किया है। यथा नाम तथा गुण वाले पात्र भागीरथी, सुमंगला, सुलक्षणा, सुरभि, झुमकी अनुराधा जूही आदि हैं। कहानीकार ने विवाह को संस्कार और लिव इन रिलेशनशिप को स्वच्छंदता और फन बताया है।
कहानीकार युवाओं को बिन उपदेश के सहज, सरल भाषा में जीवन के प्रति आस्था, कर्म के प्रति लगाव और बुराइयों से बचना सिखाता है। इन कहानियों की श्रेष्ठता त्रासदी में भी सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना है। समाज में हाशिए पर आए लोगों के जीवन की संघर्षमयी गाथा के साथ-साथ उनकी पावनता को चित्रित करना कहानीकार का उद्देश्य है। सहज सरल देशज शब्दों के साथ मुहावरों का प्रयोग चार चाँद लगा देता है जैसे- पत्थर होना, बदहवास स्त्री, कहर टूटना, आसमान की ओर ताकना, चील की मानंद झपटना, हृदय फटना, ऊँट के मुँह में जीरा, आसमान से आग बरसना, सब्जबाग दिखाना आदि।

निशंक जी की कहानियाँ काव्यशास्त्रीय दृष्टि से साधारणीकरण का निर्वाह करती है। संवेदना के भाव को उजागर करती हैं। इनके पात्र पाठक को अपने इर्द-गिर्द मिल जाएँगे। इनकी कहानियाँ पठनीय ही नहीं संग्रहणीय भी हैं। अमेरिकन साहित्यकार डेविड फ्राउले इनकी कहानियों को समस्त विश्व के पिछड़े वर्ग के संघर्ष की जीती जागती मिसाल कहते हैं। युगांडा के प्रधानमंत्री रूहकाना मानवीय संवेदनाओं की अतुलनीय मीसल कहते हैं। ये कहानियाँ लोगों को आईना दिखाने का काम करती हैं। अंतहीन की अंतहीन गूँज पाठक के मानसपटल पर अंकित होती है। विश्व साहित्यकारों की गरिमा को शोभायमान करती है। जो वास्तविकता के धरातल को साथ लेकर चल रही हैं। कहीं भी पाठक टूटता या ऊबता नहीं है। शब्दों की बयार, वाक्य संरचना, पाठक में नई ऊर्जा पैदा कर देती हैं।

डॉ. सुधांशु कुमार शुक्ला
चेयर हिंदी
आई.सी.सी.आर
वार्सा यूनिवर्सिटी
वार्सा पोलैंड
+48579125129

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