हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी
इश्क और वो इश्क की जांबाज़ियाँ | ग़ज़ल (काव्य)    Print this  
Author:उपेन्द्रनाथ अश्क | Upendranath Ashk

इश्क और वो इश्क की जांबाज़ियाँ
हुस्न और ये हुस्न की दम साज़ियाँ

वक्ते-आख़्रिर है, तसल्‍ली हो चुकी
आज तो रहने दो हेलाबाज़ियाँ

गैर हालत है तेरे बीमार की
अब करेंगी मौत चारासाज़ियाँ

'अश्क' क्या मालूम था, रंग लायेंगी
यों तबीयत की तेरी नासाज़ियाँ

-उपेद्रनाथ अश्क

विशेष : अश्क जी किसी ज़माने में उर्दू में ग़ज़ल कहा करते थे लेकिन कॉलेज के दिनों में ही ग़ज़ल छोड़कर कहानी लिखने लगे थे।

Previous Page  |  Index Page  |   Next Page
 
Post Comment
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश