यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? - चंद्रशेखर मिश्र।
आत्मकथ्य : बालेश्वर अग्रवाल (विविध)    Print this  
Author:बालेश्वर अग्रवाल

जीवन के नब्बे वर्ष पूरे हो रहे हैं आज जब मैं यह सोच रहा हूँ, तो ध्यान में राष्ट्रकवि स्व. श्री माखन लाल चतुर्वेदी की प्रसिद्ध कविता 'पुष्प की अभिलाषा' की पक्तियां याद आ रही है।

चाह नहीं में सुरबाला के, गहनों में गुथा जाऊँ!
चाह नहीं प्रेमी माला में, विंध, प्यारी को ललचाऊँ!!
मुझे तोड़ लेना बनमाली, उस पथ पर तुम देना फेंक!
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जाएँ वीर अनेक!!

राष्ट्र के हित में समाज ने जो निर्देश दिया, उसके अनुसार यथाशक्ति कार्य करने की चेष्टा की। इसमें कितनी सफलता मिली-समाज ही तय करे।

1939 में मैंने मैट्रिकुलेशन परीक्षा पास की। पिताजी के इच्छा थी कि मैं सरकारी नौकरी करूं। मेरे बड़े भाई डाक्टर बन चुके थे और दूसरे भाई माइनिंग इंजीनियर थे। मुझे भी इलेक्ट्रिकल इंजिनीयरिंग के लिये चुना गया और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के इंजिनियरिंग कॉलेज में दाखिला मिल गया। इंजीनियरिंग मेरी पसंद का विषय नहीं था। प्रथम और द्वितीय वर्ष परीक्षा में अच्छे अंक मिले। मैं चार वर्ष में इंजीनियर बन गया। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र जीवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्पर्क हुआ। मैंने उसके अनुरूप जीवन ढालने का प्रयास किया।

इसके लिये मैंने अविवाहित रहकर काम करने का निर्णय किया। पिताजी ने मुझे सहयोग दिया। आज मैं पुरानी बातों को सोचता हूँ तो लगता है निर्णय ठीक रहा।

डालमिया नगर (बिहार) में इंजीनियर के पद पर नियुक्त होकर 1945 से 1948 तक तीन वर्ष तक वहां कार्य किया और समाज की सेवा की। दिसम्बर 1948 में संघ के सत्याग्रह के अवसर पर भूमिगत हो गया और पटना में मेरे लिये नया कार्यक्षेत्र चुना गया। प्रकाशन कार्य से नया सम्बन्ध शुरू हुआ। 'प्रवर्तक' साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन किया। चन्द्रगुप्त प्रकाशन लिमिटेड नामक प्रकाशन संस्था की स्थापना की।

1951 में मेरे जीवन का नया अध्याय प्रारम्भ हुआ। हिन्दुस्थान समाचार समिति के पटना क्षेत्र का उत्तरदायित्व मुझे सौंपा गया, जिसका निवर्हन 30 वर्षों तक (1982 तक) करता रहा। पटना में सफलतापूर्वक कार्य करने के बाद 1955 में मेरा स्थानांतरण दिल्ली कर दिया गया और दिल्ली कार्यालय का उत्तरदायित्व सौंपा गया।

दस वर्षों के बाद 1965 में हिन्दुस्थान समाचार की पूरी जिम्मेदारी मुझे सौंप दी गई। इस अवधि में कार्य विस्तार तेजी से हुआ। सारे देश में इसका कार्य फैल गया। 1974 में एक नया प्रयोग पत्रकारिता के क्षेत्र में किया गया। हिन्दुस्थान समाचार के कर्मचारियों ने सहकारिता के आधार पर एक सोसायटी का गठन किया, जिसने कानूनी ढंग से हिन्दुस्थान समाचार समिति का स्वामित्व भी प्राप्त किया। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी ने इसकी सराहना की। पत्रकारिता के क्षेत्र में यह एक अभिनव प्रयोग था।
1982 में राजनीतिक कारणों से, हिन्दुस्थान समाचार के कर्मचारियों में आपसी मतभेद पैदा हो गया जिसके कारण सहकारिता विभाग ने हिन्दुस्थान समाचार समिति का कार्य अपने जिम्मे ले लिया। इस स्थिति में मेरे लिये हिन्दुस्थान समाचार में काम करना संभव नहीं था।

इसके बाद समाज ने मेरे लिये एक नया कार्यक्षेत्र चुना-वह था अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद। भारतीय मूल के लगभग 2 करोड़ लोग विभिन्न देशों में फैले हुए है, उनसे सम्पर्क करना, उनकी समस्याओं के समाधान में सहयोग देना, संगठन के रूप में कार्य करना बहुत ही कठिन काम था। सभी के सहयोग से इस कार्य में भी मुझे सफलता मिली। श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने भी मेरे कार्यों की सराहना की। 30 वर्षों के अथक परिश्रम से अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद को अब दृढ आधार मिल गया है।

भारत सरकार ने दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर प्रवासी भवन के लिये एक प्लाट आवंटित किया। प्रवासी भवन का निर्माण मेरे लिये एक सपना था, जो सभी के सहयोग से पूर्ण हो गया। इस भवन का शिलान्यास भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 14 दिसम्बर, 2003 को किया और इसका उद्घाटन मॉरीशस के राष्ट्रपति सर अनिरुद्ध जगन्नाथ ने 1 दिसम्बर, 2009 को किया।

मेरी एक ही आकाक्षा थी कि कार्य करते-करते जीवन समाप्त हो जाए। परन्तु कुछ महीने से इसमें सफलता नहीं मिल रही है। मुझे प्रवासी भवन में दूसरे के सहारे से रहना पड़ रहा है। फिर भी प्रवासी भवन में रहकर यथाशक्ति काम देखता रहता हूँ।

बालेश्वर अग्रवाल, महासचिव
अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद

यह वक्तव्य स्व. बालेश्वर अग्रवाल ने 17 जुलाई 2011 को नब्बे वर्ष की आयु होने पर लिखवाया था।

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