हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना
होली  (काव्य)    Print this  
Author:अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' | Ayodhya Singh Upadhyaya Hariaudh

मान अपना बचावो, सम्हलकर पाँव उठावो ।
गाबो भाव भरे गीतों को, बाजे उमग बजावो ॥
तानें ले ले रस बरसावो, पर ताने ना सहावो ।
भूल अपने को न जावो ।।१।।

बात हँसी की मरजादा से कड़कर हँसो हँसावो ।
पर अपने को बात बुरी कह आँखों से न गिरावो ।
हँसी अपनी न करायो ॥२॥

खेलो रंग अबीर उड़ावो लाल गुलाल लगावो ।
पर अति सुरंग लाल चादर को मत बदरंग बनावो ।
न अपना रंग गॅवाबो ॥३॥

जन्म-भूमि की रज को लेकर सिर पर ललक चढ़ावो ।
पर अपने ऊँचे भावों को मिट्टी में न मिलावो।
न अपनी धूल उड़ावो ॥४॥

प्यार-उमग-रंग में भीगी सुन्दर फाग मचावो ।
मिलजुल जी की गाँठें खोलो हित की गाँठ बँधावो।
प्रीति की बेलि उगावो ||५||

--हरिऔध

Previous Page  |  Index Page  |   Next Page
 
Post Comment
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश