हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना
दहशत (काव्य)    Print this  
Author:लक्ष्मी शंकर वाजपेयी

सुबह-सुबह जब पढ़ रहा होता हूँ अख़बार
पीठ पर आकर लद जाती है बेटी
और अपने नन्हें-नन्हें हाथों से मेरी गर्दन को लपेट कर
झूला सा झूलते हुए
अक्षर सीख लेने के नये-नये जोश में
ज़ोर-ज़ोर से पढ़ती है
अखबार की सुर्खियाँ
कभी जिज्ञासा, कभी कौतूहल, कभी गुस्से से भरकर
अक्सर अपनी मनचाही खबर छोड़कर…
विस्तार से पढ़ता हूं,
उसकी बताई खबर
समझाता हूँ कार्टून का मतलब
लेकिन आज उसके आते ही
डरकर छुपा लेता हूंँ अख़बार
उसका ध्यान बंटाने को करता हूं
इधर उधर की बातें…
अखबार का जो पृष्ठ मेरे सामने है
उस पर बड़ी-बड़ी सुर्खियों में छपा है
एक नन्ही मासूम से
पाशविकता का वीभत्स ब्यौरा..!
ये सोचकर ही सहम जाता हूं
कि अगर बेटी ने पूछ लिया
किसी घिनौने शब्द का अर्थ
तो उसे क्या जवाब दूंगा..!!!

-लक्ष्मी शंकर वाजपेयी

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