हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी
छवि नहीं बनती (काव्य)    Print this  
Author:सपना सिंह ( सोनश्री )

निराला पर सपना सिंह (सोनश्री) की कविता

निराला जी, निराले थे।
इसलिए तो,
सबको, भाये थे।
आपके, शब्दों में,
जादू था ऐसा,
कि
आज भी,
गूंजते हैं वही,
जेहन में,
बार बार,
कर्नाकाश के,
अक्षय पटल पर ।
अभाव में,
भाव,
आये थे कैसे ?
आज तो,
भाव में भाव,
आता नहीं ।
सोचती हूँ ,
कहाँ से,
उमड़ेगी कविता,
जिसमें,
झलकेगी,
छवि आपकी ।
क्या कहूँ,
शब्द,
नहीं बनते,
भाग, जाते हैं,
आपके,
नाम से, शब्दों के,
चमत्कार से
निराला जी, निराले थे,
इसलिए तो,
सबको,
भाये थे आप ।

- सपना सिंह ( सोनश्री )
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