हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना
यंत्र, तंत्र, मंत्र | व्यंग्य (विविध)    Print this  
Author:डॉ सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त

एक यंत्र था। उसके लिए राजा-रंक एक समान थे। सो, मंत्री जी की कई गोपनीय बातें भजनखबरी को पता चल गयीं। मंत्री जी कुछ कहते उससे पहले ही भजनखबरी उनकी पोल खोल बैठा। पहले तो मंत्री जी को खूब गुस्सा आया। वह क्या है न कि कुर्सी पर बने रहने के लिए गुस्से को दूर रखना पड़ता है। इसलिए मंत्री जी ने भजनखबरी को नौकरी से बर्खास्त करने की जगह उसे उसके यंत्र के साथ अपने कार्यालय में नियुक्त कर दिया।

यहाँ भजनखबरी का एक मात्र काम नए-नए फार्मूले खोज निकालना था। इसी कड़ी में उसने एक नया फार्मूला खोज निकाला – ‘एक में दो।’ बहुत जल्द उसका फार्मूला लोगों की जुबान पर चढ़ गया। एक दिन किसी काम से वह मेरे पास आया। मैंने उसके फार्मूले की जाँच के लिए जानबूझकर जेब से एक मात्र सौ रुपए की नोट निकालकर पूछ बैठा यह कितने नोट हैं? तुरंत भजनखबरी ने कहा – दो। मेरा सिर चकराया। मैंने पूछा वह कैसे? तो उसने कहा कि इसमें दो पचास की नोट हैं। उसकी बात में लॉजिक था। इसलिए मैं चुप बैठ गया। तभी मेरी लड़की आयी और भजनखबरी को नमस्ते करने लगी। वह मेरी इकलौती लड़की थी। मैंने फिर से उसे पूछ बैठा मेरी कितनी लड़की है? उसने कहा – दो। इस बार मेरा सिर और बुरी तरह से चकरा गया। मैं फिर पूछ बैठा वह कैसे? उसने कहा – वह तुम्हारी लड़की है। साथ ही तुम्हारी पत्नी की लड़की भी है। हुई न दोनों के लड़की। मैं चुप रह गया।

आज भजनखबरी को मरे कई वर्ष बीत गए। लेकिन भजनखबरी जैसे गुण नेताओं में साफ़ दिखायी देते हैं। घटना एक घटती है लेकिन परिप्रेक्ष्य दो निकलते हैं। जैसे देश पर हमला हुआ तो विपक्ष के लिए बटेर हाथ लग जाता है। यदि सरकार उसका मुँहतोड़ जवाब देती है तो दूसरी ओर छप्पर फाड़कर वोट मिलते हैं। बढ़ती जनसंख्या से भुखमरी बढ़ती है, लेकिन नेताओं की मानें तो अधिक लोग होने पर अधिक राशन मिलता है। महामारी फैलती है तो लोग मरते हैं, वहीं वैक्सिन देकर जान बचा ली जाए तो महामारी भी वोट देने का जरिया बनता है। शराब पीने से लीवर खराब होता है, आदमी मर जाता है, लेकिन दूसरी यही हमारी आर्थिक स्थिति को सुधारने का सबसे बड़ा जरिया है। जनता का मास्क लगाने को कहता है, खुद मास्क पहनने से बचता है। मास्क के नियमों का पालन न करने पर दो हजार का हर्जाना वसूला जाता है, वहीं चुनावों इन नियमों की ऐसी-तैसी की जाती है। संविधान में कानून बनाया जाता है और बाहर उसे तोड़ा जाता है। एक धर्म के अनुयायी कोरोना फैलाते हैं, वहीं दूसरे धर्म के अनुयायी बड़े-बड़े मेले आयोजित करते हैं तब वहाँ कोरोना नहीं होता। नेता का मुँह एक होता है, लेकिन बातें द्वंद्वार्थी होते हैं। बाहर कुछ और अंदर कुछ।

-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
 ई-मेल : drskm786@gmail.com

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