विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है। - वाल्टर चेनिंग
 
हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय नहीं रहे (विविध)     
Author:भारत-दर्शन समाचार

भारत, 16 सितंबर : हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय का कल रात एक निजी अस्पताल में निधन हो गया।


डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय 78 वर्ष के थे। डाॅ० श्रोत्रिय के परिवार में उनकी पत्नी के अतिरिक्त एक पुत्र और एक पुत्री हैं।

डाॅ. श्रोत्रिय कुछ समय से बीमार थे। उन्हें के गंगा राम आस्पताल में भर्ती कराया गया था जहां उन्होंने कल रात आठ बजे अंतिम सांस ली।

डाॅ. श्रौत्रिय की अंतिम इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार हरिद्वार में हो, इसलिए उनकेे पार्थिव शरीर को हरिद्वार ले जाया गया है।

19 दिसंबर 1938 को मध्य प्रदेश के जावड़ा में जन्मे डाॅ० श्रोत्रिय ने उज्जैन में उच्च शिक्षा प्राप्त की और हिंदी में पी.एचडी तथा डी.लिट करने के बाद वे भोपाल के हमीदिया कालेज में शिक्षक नियुक्त हुए थे।

आप 'मध्य प्रदेश साहित्य परिषद' की चर्चित पत्रिका साक्षात्कार के संपादक थे। आपने भोपाल से ही निकलने वाली पत्रिका अक्षरा का भी संपादन किया था। आप कोलकाता से भारतीय भाषा परिषद की पत्रिका वागर्थ के भी संपादक रहे। आपने नया ज्ञानोदय का भी संपादन किया। पिछले कुछ वर्षों में साहित्य अकादमी की पत्रिका 'समकालीन भारतीय साहित्य' का भी संपादन किया। आप सेवानिवृत्त होने के पश्चात स्वतंत्र लेखन कर रहे थे।

साहित्य के क्षेत्र में डॉ. श्रोत्रिय ने लगभग सभी विधाओं में सफलतापूर्वक सृजन किया। आलोचना, निबंध और नाटक के क्षेत्र में आपका योगदान उल्लेखनीय है।

 

 

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