लतीफ घोंघी
आधुनिक हिंदी साहित्य में लतीफ घोंघी (1935–2005) एक ऐसे विशिष्ट व्यंग्यकार हैं, जिनका लेखन तीखी आक्रामकता के बजाय 'मखमली चुभन' के लिए जाना जाता है। छत्तीसगढ़ के महासमुंद में जन्मे घोंघी जी ने आर्थिक संघर्षों के बीच 1960 के दशक से लिखना शुरू किया। उनका मानना था कि सफल व्यंग्य वह है जो पाठक के मुँह का स्वाद न बिगाड़े, बल्कि उसे एक 'मीठा दर्द' और 'भीतरी गुदगुदी' का अहसास कराए। उनकी कृति 'नील-क्षीर' व्यंग्य जगत में मील का पत्थर मानी जाती है।
उनकी प्रमुख व्यंग्य कृतियाँ इस प्रकार हैं: उड़ते उल्लू के पंख, मृतक से क्षमा याचना सहित, बीमार न होने का दुःख, संकट लाल जिन्दाबाद, बब्बूमियां कब्रिस्तान में, तीसरे बन्दर की कथा, मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ, किस्सा दाढ़ी का, कुत्ते से साक्षात्कार, खबरदार व्यंग्य, जूते का दर्द, सोने का अण्डा, चोरी न होने का दुःख, मुर्दानामा, बधाइयों के देश में, लाटरी का टिकट, क्षमा करना हम दुखी नहीं है, सड़े हुए दाँत, ज्ञान की दुकान, बुद्धिमानों से बचिए, जुगुलबन्दी एवं मेरा मुख्य अतिथि हो जाना।
घोंघी जी ने राजनीति, प्रशासन, सरकारी तंत्र और सामाजिक पाखंड पर गहरी चोट की है। वे विशेष रूप से सरकारी कार्यप्रणाली और उसमें व्याप्त स्वार्थपरता को उजागर करने में माहिर थे। हरिशंकर परसाई और शरद जोशी जैसी परंपरा के इस चमकते सितारे ने अपनी शालीन कलम से समाज को आईना दिखाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
[भारत-दर्शन]