डॉ ज्ञान चतुर्वेदी का जीवन परिचय

रचनाकार: हमारे व्यंग्यकार

डॉ ज्ञान चतुर्वेदी
डॉ ज्ञान चतुर्वेदी

जन्म: 2 अगस्त 1952
जन्म स्थान: मऊरानीपुर, ज़िला झाँसी (उत्तर प्रदेश)
पेशा: हृदय रोग विशेषज्ञ (Cardiologist) एवं ख्यात व्यंग्यकार-उपन्यासकार

व्यक्तिगत एवं व्यावसायिक जीव
•    शिक्षा एवं करियर: डॉ. चतुर्वेदी ने चिकित्सा के क्षेत्र में अपना करियर बनाया। वे मध्य प्रदेश के प्रतिष्ठित हृदय रोग विशेषज्ञ रहे और भारत सरकार के B.H.E.L. से संबद्ध चिकित्सालय में तीन दशकों से अधिक सेवा देने के बाद शीर्ष पद से सेवानिवृत्त हुए।
•    पारिवारिक पृष्ठभूमि: साहित्य के संस्कार उन्हें विरासत में मिले। उनके नाना ओरछा के राजकवि थे और उनके मामा भी प्रसिद्ध कवि थे। उनके घर में मैथिलीशरण गुप्त जैसे महान कवियों का आना-जाना रहता था।

साहित्यिक यात्रा की शुरुआत
•    प्रथम रचना: सातवीं कक्षा में 'पंचवटी' से प्रेरित होकर 52 छंदों का खंडकाव्य लिखा।
•    शुरुआती प्रभाव: 11वीं कक्षा में जासूसी उपन्यास लिखे और उर्दू साहित्य में रुचि दिखाई।
•    व्यंग्य की ओर झुकाव: 1965 में हरिशंकर परसाई को पढ़ने के बाद उन्होंने व्यंग्य विधा को अपनाने का निश्चय किया। इसके बाद शेखर जोशी और श्रीलाल शुक्ल जैसे लेखकों के प्रभाव में आए।

प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ
उपन्यास:
•    नरक-यात्रा: (चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था पर प्रहार)
•    पागलखाना: (प्रतिष्ठित उपन्यास)
•    बारामासी, मरीचिका, हम न मरब।

प्रमुख व्यंग्य-संग्रह:
•    प्रेत कथा, दंगे में मुर्गा, मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएँ, बिसात बिछी है, ख़ामोश! नंगे हमाम में हैं, प्रत्यंचा और बाराखड़ी।

संपादन:
•    शरद जोशी की रचना 'प्रतिदिन' (प्रथम खंड) का अंजनी चौहान के साथ संपादन।

लेखन और स्तंभ (Columns)
•    सक्रिय लेखन की शुरुआत सत्तर के दशक में 'धर्मयुग' पत्रिका से हुई।
•    'इंडिया टुडे' और 'नया ज्ञानोदय' में दस वर्षों तक नियमित स्तंभ लेखन।
•    'राजस्थान पत्रिका' और 'लोकमत समाचार' जैसे दैनिक पत्रों में लंबे समय तक व्यंग्य स्तंभकार रहे।
•    अब तक 1000 से अधिक व्यंग्य रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं।

सम्मान एवं पुरस्कार
   पद्मश्री: भारत सरकार द्वारा नागरिक सम्मान।
•    व्यास सम्मान: साहित्य के क्षेत्र में विशेष योगदान हेतु।
•    राष्ट्रीय शरद जोशी सम्मान एवं अन्य कई प्रतिष्ठित राज्य स्तरीय पुरस्कार।


डॉ ज्ञान चतुर्वेदी का व्यंग्य  'अपने अपने बाड़े' पढ़ें।