बेढब बनारसी
हास्य-व्यंग्य की जीवंत परंपरा के पुरोधा
हिंदी साहित्य में 'हंसोड़ परंपरा' के सबसे सशक्त और जीवंत हस्ताक्षर कृष्णदेव प्रसाद गौड़, जिन्हें दुनिया 'बेढब बनारसी' के नाम से जानती है, काशी की मस्ती और बौद्धिकता के अनूठे संगम थे। उनका जन्म 11 नवंबर, 1885 (कहीं-कहीं 1895 भी लिखा है) वाराणसी की उस मिट्टी में हुआ, जहाँ का कण-कण खिलखिलाहट और पांडित्य से भरा है। उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने अध्यापन को अपना पेशा बनाया और एक प्रतिष्ठित शिक्षाशास्त्री के रूप में पहचान स्थापित की।
वे अपने बारे में कहते थे--
काशी अविनाशी का अदना निवासी एक
नाम कृष्णदेव पर रंग नहीं काला है,
सेवक सरस्वती का दास दयानन्द का हूँ
टीचरी में निकला दिमाग का दिवाला है.
काव्य लिखता हूँ नहीं हँसने की चीज निरी
रचना में व्यंग्य और विनोद का मसाला है
पावन प्रसाद ‘दीन’ जी* का मिला ‘बेढब’ है
सूर हूँ न तुलसी पंथ मेरा निराला है.
सहज और मौलिक व्यंग्य
बेढब जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनके हास्य-व्यंग्य में कृत्रिमता या बनावट का लेश मात्र भी नहीं था। उन्होंने समाज की विसंगतियों पर जो प्रहार किए, वे उनके आसपास के परिवेश और आम आदमी के जीवन से उपजे थे। वे काशी के 'बेढ़ब संपादक' के रूप में विख्यात रहे और उन्होंने नागरी प्रचारिणी पत्रिका, आँधी, प्रसाद, खुदा की राह पर, तरंग, बेढब तथा करेला जैसी पत्र-पत्रिकाओं का कुशलतापूर्वक संपादन कर हिंदी पत्रकारिता को समृद्ध किया।
प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ
उनकी लेखनी कविता, उपन्यास, निबंध और इतिहास लेखन जैसे विविध क्षेत्रों में समान रूप से चली। उनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं:
काव्य संग्रह: बेढ़ब की बैठक, काव्य कमल, बिजली, बेढ़ब की वाणी, नया ज़माना, महत्त्व के गुमनाम पत्र एवं जब मैं मर गया था।
उपन्यास व अन्य गद्य: लेफ्टिनेंट पिगसन की डायरी, हुक्का पानी, उपहार, बनारसी इक्का, गांधी का भूत और तनातन।
इतिहास एवं आलोचना: हिंदी साहित्य की रूपरेखा, हिंदी साहित्य का इतिहास, गालिब की कविता, रूहे सुखन।
बेढब बनारसी केवल हंसाने वाले रचनाकार नहीं थे, बल्कि वे अपनी 'बेढब' शैली में समाज को आईना दिखाने वाले गंभीर चिंतक भी थे। उर्दू और हिंदी दोनों ही भाषाओं पर उनका समान अधिकार था, जो उनकी कृतियों में स्पष्ट झलकता है। 6 मई, 1968 को उनका निधन हुआ, किंतु उनकी रचनाओं की मिठास और व्यंग्य की धार आज भी साहित्य प्रेमियों को प्रभावित करती है।
निधन
6 मई, 1968
*‘दीन’ जी= लाला भगवान दीन
[भारत-दर्शन]