श्रीलाल शुक्ल का जीवन परिचय

रचनाकार: भारत-दर्शन

श्रीलाल शुक्लश्रीलाल शुक्ल

आधुनिक हिंदी साहित्य के अप्रतिम शिल्पी

समादृत साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल का जन्म 31 दिसंबर 1925 को लखनऊ जनपद के अतरौली गाँव में हुआ था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक करने के पश्चात उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अंतर्गत विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर अपनी सेवाएँ दीं और 1983 में सेवानिवृत्त हुए। प्रशासन में रहने के कारण उन्हें भारतीय समाज और व्यवस्था की रग-रग का जो अनुभव प्राप्त हुआ, वही उनके साहित्य की शक्ति बना।

साहित्यिक अवदान और 'राग दरबारी'
श्रीलाल शुक्ल के लेखन की शुरुआत कहानियों और निबंधों से हुई। उनका कालजयी उपन्यास 'राग दरबारी' आधुनिक हिंदी साहित्य का एक ऐसा 'क्लासिक' है, जो आज भी अत्यंत प्रासंगिक बना हुआ है। स्वातंत्र्योत्तर भारतीय ग्रामीण जीवन की तटस्थ और यथार्थपरक पड़ताल करने वाली इस कृति ने उन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाई। प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह के अनुसार, शुक्ल जी हमारे समय का एक 'विदग्ध भाष्य' रचते हैं, जो किसी विचारधारा से प्रभावित न होकर समाज के आलोचनात्मक परीक्षण का रचनात्मक परिणाम है।

प्रमुख कृतियाँ (एक नज़र में)
उपन्यास: सूनी घाटी का सूरज, अज्ञातवास, राग दरबारी, आदमी का जहर, सीमाएँ टूटती हैं, मकान, पहला पड़ाव, विस्रामपुर का संत, बब्बर सिंह और उसके साथी एवं राग-विराग।

व्यंग्य-संग्रह, कहानी एवं अन्य: अंगद का पाँव, यहाँ से वहाँ, मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ, उमरावनगर में कुछ दिन, कुछ जमीन पर कुछ हवा में, आओ बैठ लें कुछ देर, अगली शताब्दी का शहर, जहालत के पचास साल, ख़बरों की जुगाली, दस प्रतिनिधि कहानियाँ, अज्ञेय: कुछ रंग कुछ राग, भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर, हिन्दी हास्य-व्यंग्य संकलन तथा मेरे साक्षात्कार।

सम्मान एवं उपलब्धियाँ
श्रीलाल शुक्ल ने अपनी व्यंग्य शैली से हिंदी उपन्यास की परंपरा में एक नई अभिरुचि पैदा की। उनके उपन्यास 'राग दरबारी' का अनुवाद अंग्रेजी सहित लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में हुआ है। साहित्य के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार, व्यास सम्मान, ज्ञानपीठ पुरस्कार (अमरकांत के साथ संयुक्त), पद्म भूषण और मध्य प्रदेश शासन के शरद जोशी सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित अलंकरणों से विभूषित किया गया।

निधन
28 अक्टूबर 2011 को लखनऊ में इस महान कलमकार का देहावसान हो गया, किंतु उनकी रचनाएँ आज भी समाज की विसंगतियों पर प्रहार करने के लिए उतनी ही जीवंत हैं।