अन्नपूर्णानंद (21 सितंबर 1895 – 4 दिसंबर 1962)
अन्नपूर्णानन्द (Annapurna) का जन्म 21 सितंबर 1895 को हुआ था। वे हिंदी साहित्य के शिष्ट और मर्यादित हास्य-व्यंग्य के प्रमुख हस्ताक्षर थे। अन्नपूर्णानन्द प्रसिद्ध मनीषी और राजनेता सम्पूर्णानन्द के अनुज थे।
अन्नपूर्णानन्द का प्रारंभिक जीवन उत्तर प्रदेश में बीता। उनकी शिक्षा गाजीपुर से आरंभ हुई और आगे चलकर वे साहित्य एवं पत्रकारिता से जुड़ गए। उन्होंने पंडित मोतीलाल नेहरू के प्रसिद्ध पत्र इंडिपेंडेंट में भी कार्य किया, जिससे उनकी वैचारिक दृष्टि और सामाजिक समझ को गहराई मिली।
साहित्य में उनका प्रवेश मात्र 22 वर्ष की आयु में हुआ, जब उनकी पहली रचना ‘खोपड़ी’ प्रसिद्ध हास्य पत्रिका मतवाला में प्रकाशित हुई। इसके बाद उन्होंने हिंदी हास्य-व्यंग्य को एक नई ऊँचाई दी।
उनकी लेखन-शैली का सबसे बड़ा गुण था—शिष्ट, सुसंस्कृत और चुटीला हास्य। उनका व्यंग्य केवल हँसी तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक कुरीतियों, विसंगतियों और अव्यवस्थाओं पर सधे हुए प्रहार करता था। वे कटाक्ष करते थे, परंतु बिना किसी कटुता या द्वेष के—यही उनकी रचनात्मक विशिष्टता थी।
काशी (वाराणसी) के परिवेश से उनका गहरा जुड़ाव था, जो उनकी रचनाओं में जीवंत रूप से दिखाई देता है। उनकी कहानियों और व्यंग्य लेखों में बनारसी जीवन, भाषा और संस्कृति का स्वाभाविक चित्रण मिलता है।
प्रमुख कृतियाँ
उनकी प्रमुख कृतियों में मेरी हजामत, मगन रहु चोला, मंगल मोद, महाकवि चच्चा, मन मयूर तथा मिसिर जी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त अकबरी लोटा जैसी रचनाएँ हिंदी व्यंग्य साहित्य की प्रतिनिधि कृतियों में गिनी जाती हैं।
वे कुछ समय तक दानवीर शिवप्रसाद गुप्त के सचिव भी रहे और उन्हें विदेश यात्रा का अवसर भी मिला, जिससे उनके अनुभव और दृष्टिकोण में व्यापकता आई।
निधन
4 दिसंबर 1962 को अन्नपूर्णानन्द का निधन हो गया। हिंदी साहित्य में उन्होंने जिस शालीन और प्रभावी हास्य-व्यंग्य की परंपरा को विकसित किया, वह आज भी प्रेरणास्रोत बनी हुई है।