डॉ. शंकर पुणतांबेकर का जीवन परिचय

रचनाकार: भारत-दर्शन

डॉ. शंकर पुणतांबेकरडॉ शंकर पुणतांबेकर

 

डॉ शंकर पुणतांबेकर: व्यंग्य की धार और यथार्थ का स्वर

हिंदी साहित्य जगत में हरिशंकर परसाई जैसी मारक क्षमता और तीखी लेखनी के धनी डॉ. शंकर पुणतांबेकर एक अग्रणी व्यंग्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं। मूलतः मध्य प्रदेश से संबंध रखने वाले पुणतांबेकर जी ने अपने लेखन के माध्यम से व्यवस्था की विसंगतियों पर गहरा प्रहार किया है।

जन्म एवं शिक्षा
डॉ. पुणतांबेकर का जन्म 26 मई, 1925 को मध्य प्रदेश के गुना जिले के कुंभराज में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा विदिशा और ग्वालियर में हुई, जिसके बाद उन्होंने आगरा से उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने हिंदी और इतिहास, दोनों विषयों में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की और आगे चलकर हिंदी साहित्य में पीएच.डी. पूर्ण की।

अध्यापन एवं कार्यक्षेत्र
उनका कार्यक्षेत्र शिक्षा और साहित्य का अद्भुत संगम रहा। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत विदिशा के जैन इंटर कॉलेज (1947-1960) से की। इसके पश्चात वे महाराष्ट्र चले गए और जलगाँव के मूलजी जेठा कॉलेज में वर्ष 1960 से 1985 तक प्राध्यापन कार्य किया, जहाँ से वे सेवानिवृत्त हुए।

प्रमुख कृतियाँ एवं साहित्य सृजन
पुणतांबेकर जी ने 25 से अधिक व्यंग्य पुस्तकों की रचना की है। उनके साहित्य में यथार्थ के प्रति अटूट प्रतिबद्धता दिखाई देती है। उनकी प्रमुख कृतियों में शामिल हैं:
उल्लेखनीय पुस्तकें: 'व्यंग्य अमरकोश', 'बाअदब बेमुलाहज़ा', 'फर्जी से पैदा भयो', 'शतरंग के खिलाड़ी', 'दुर्घटना से दुर्घटना तक' और 'गिद्ध मँडरा रहा है'।
नाटक: 'विजिट यमराज की', 'तीन व्यंग्य नाटक' और 'एक मंत्री स्वर्गलोक में'। उनके आगामी चर्चित नाटकों में 'मालरोड मर्डर' एवं 'सफेद कौए काले हंस' विशेष रूप से उल्लेखनीय रहे हैं।

लेखन शैली और विशेषताएँ
उनके नाटकों और व्यंग्यों को 'शब्दों का ज्वालामुखी' कहा जाता है, जो तिक्त यथार्थ का लावा उगलते हैं। उनके लेखन में फूहड़ता का स्थान नहीं है; बल्कि वे राजनीतिक पतन और सामाजिक व्यवस्था की सड़न को पूरी नग्नता और तार्किकता के साथ उजागर करते हैं। उनके संवाद और पात्र विचारोत्तेजक होते हैं, जहाँ पाठकों को केवल मनोरंजन (वाह-वाह) नहीं, बल्कि व्यवस्था की पीड़ा (आह-आह) का अहसास होता है।

सम्मान 
साहित्य के प्रति उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया, जिनमें मुख्य हैं:
•    व्यंग्य के चकल्लस (1994)
•    व्यंग्यश्री (2002)
•    अक्षर साहित्य सम्मान

निधन
हिंदी व्यंग्य का यह तेजस्वी हस्ताक्षर 31 जनवरी, 2016 को सदैव के लिए मौन हो गया, किंतु उनकी कृतियाँ आज भी पाठकों को झकझोरने और सोचने पर मजबूर करने की शक्ति रखती हैं।