हिंदी भाषा को भारतीय जनता तथा संपूर्ण मानवता के लिये बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है। - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।
सद्भाव (कथा-कहानी)  Click to print this content  
Author:डॉ. सतीश राज पुष्करणा

आधुनिक विचारों की मीता की शादी हुई तो उसने न तो सिन्दूर लगाया और न ही साड़ी, सलवार-कमीज आदि पहनना स्वीकार किया| वह कुँवारेपन की तरह जीन्स एवं टी-शर्ट ही पहनती।

ससुराल में सभी उसे अजीब नजरों से देखते| मोहल्ले टोले में उसका सिन्दूर न लगाना और उसका जीन्स एवं टी-शर्ट पहनना, चर्चा का विषय बन गया| मीता सुनती किन्तु उसे कभी किसी की भी परवाह नहीं थी। वह कुँवारेपन की तरह ही समय परोफ्फिस जाती और समय पर घर लौट आती।

एक दिन वह आई और सीधे पलंग पर लेट गयी। सास ने बहुत वात्सल्य भाव से पुछा,"क्या बात है बेटे? क्या तबियत खराब है?"

"हाँ ! कुछ बुखार-सा लग रहा है...सिर आदि में भी बहुत दर्द है।"

सास अभी उसकी तबियत के बारे में समझ ही रही थी कि उसके ससुर डॉक्टर ले आये।"

डॉक्टर ने ठीक से देखा और दावा लिख कर चले गए।

ऑफिस से लौटकर सत्यम अभी घर में प्रवेश कर ही रहा थे कि डॉक्टर को घर से निकलते देख सत्यम परेशान हो गया। उसने साथ चल रहे पिता से पूछा, "क्या हुआ? किसकी तबियत खराब है?"

"मीता की... चिंता की कोई बात नहीं।"

इतना सुनते ही सत्यम लपककर मीता के पास पहुँचा, “क्या हुआ मीते?” चिंता की रेखाएँ सत्यम के चेहरे पर स्पष्ट थीं, जिन्हें मीता ने पढ़ लिया।

सत्यम तुरंत पिटा की ओर बढ़ा, “पापा! प्रेसक्रिप्शन कहाँ है? दीजिये मैं दवाएँ ले आता हूँ।”

“बेटा! मैं जब जा ही रहा हूँ तो तू क्यों परेशान होता है?”

“नहीं पापा! आप लोग मीता को देखें... ,मैं दवा लेकर आता हूँ|” यह कहकर वह बाईक पर स्वर हुआ और बाज़ार की ओर बढ़ गया।”

मीता सोचने लगी! अरे यह कैसा परिवार है ज़रा-सा बुखार होने पर सबने जमीन-आस्मां एक कर दिया। इतना प्यार मुझसे... ख़ुशी से उसकी आँखें छलछला आयीं।

आँखों में पानी देखकर सास ने कहा, “बेटे! तू चिंता न कर, तू जल्दी ठीक हो जायेगी। ले ! तब तक तू चाय पी ले...सत्यम दवा लेकर आता ही होगा।”

“माँ-जी ! मुझे हुआ ही क्या है? ... बुखार एकाध दिन में उतर जायेगा।”

“हिल नहीं बेटा! चुपचाप आराम से पड़ी रहो।”

मीता कुछ नहीं बोली| सत्यम दवाएँ ले आया... जिन्हें खाकर वह सो गयी। दो-तीन दिन बाद जब वह तैयार होकर ऑफिस जाने लगी तो सबके आश्चर्य की सीमा न रही। आज उसकी माँग में सिन्दूर भी था और बदन साड़ी और ब्लाउज से भी ढका था। सास-ससुर के चरण-स्पर्श करके बहु ऑफिस जाने हेतु अपनी गाड़ी की ओर बढ़ गयी।

-डॉ. सतीश राज पुष्करणा

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