अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। - भवानीदयाल संन्यासी।
चोर और पवहारी बाबा (कथा-कहानी)    Print  
Author:स्वामी विवेकानंद
 

प्रसिद्ध योगी पवहारी बाबा गंगातट पर निर्जन वास करते थे। एक रात बाबाजी की कुटिया में एक चोर घुसा। कुछ बरतन, कपड़े और एक कंबल ही बाबा की कुल जमा पूंजी थी। चोर बरतनों को बांधकर जल्दी से निकल जाने का प्रयास करने लगा। जल्दबाजी में वह कुटिया की दीवार से टकरा गया और घबराहट में भागते समय चोरी का सामान भी गिर गया।

बाबा आसन से उठे और चोर के पीछे दौड़ने लगे। काफी दूर तक पीछा करने के बाद बाबा ने उसे पकड़ ही लिया। भयभीत चोर कांप रहा था। लेकिन बाबा उसके चरणों में गिर पड़े और आंखों में आंसू भरकर बोले- 'प्रभु आज आप चोर के वेश में मेरी कुटिया में आए पर आपने कुछ चीजें छोड़ दी थीं। कृपया इन्हें भी अपने साथ ले जाएं।' वह चोर भाव-विभोर हो गया और बाबा के प्रेमपूर्वक किए आग्रह से उसे वह सामान स्वीकारना पड़ा। बाबा ने एक अपराधी में ईश्वर को देखा था।

कथा के अंत में संत ने स्वामी विवेकानंदजी से पूछा कि क्या आप जानते हैं कि वह चोर कौन था? अनभिज्ञता प्रकट करने पर उन्होंने बताया वह चोर मैं था।

[ भारत-दर्शन संकलन]

[अपने भारत भ्रमण के दौरान स्वामी विवेकानंद एक संत से मिले जिसने उन्हें पवहारी बाबा की उपरोक्त कथा सुनाई थी। ] 

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