हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। - राजेंद्रप्रसाद।
सामने गुलशन नज़र आया | ग़ज़ल (काव्य)    Print  
Author:डॉ सुधेश
 

सामने गुलशन नज़र आया
गीत भँवरे ने मधुर गाया ।

फूल के संग मिले काँटे भी
ज़िन्दगी का यही सरमाया ।

उन की महफ़िल में क़दम मेरा
मैं बडी गुस्ताखी कर आया ।

आँख में भर कर उसे देखा
फिर रहा हूँ तब से भरमाया ।

चोट ऐसी वक्त ने मारी
गीत होंठों ने मधुर गाया ।

धुंध ऐसी सुबह को छाई
शाम का मन्जर नज़र आया ।

आँख टेढ़ी जब हुई उन की
ज़िन्दगी ने बस क़हर ढाया ।

- सुधेश

 

Back
 
 
Post Comment
 
  Captcha
 

भारत-दर्शन रोजाना

Bharat-Darshan Rozana

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें