अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। - भवानीदयाल संन्यासी।
मैं अपनी ज़िन्दगी से | ग़ज़ल (काव्य)    Print  
Author:कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar
 

मैं अपनी ज़िन्दगी से रूबरू यूँ पेश आता हूँ
ग़मों से गुफ़्तगू करता हूँ लेकिन मुस्कुराता हूँ

ग़ज़ल कहने की कोशिश में कभी ऐसा भी होता है
मैं ख़ुद को तोड लेता हूँ, मैं ख़ुद को फिर बनाता हूँ

कभी शिद्दत से आती है मुझे जब याद उसकी तो
किसी बुझते दिये जैसा ज़रा-सा टिमटिमाता हूँ

सज़ा देना है तेरा काम, कोताही बरतना मत
मैं नाक़र्दा गुनाहों का मुसल्सल ऋण चुकाता हूँ

मेरी मजबूरियां मेरे उसूलों से हैं टकराती
जहाँ पर सर उठाना था वहाँ पर सर झुकाता हूँ

मेरे अल्फ़ाज़ का जादू तेरे सर चढ़ के बोलेगा
दिखाई वो तुझे देगा, तुझे जो मैं दिखाता हूँ


- कृष्ण सुकुमार
153-ए/8, सोलानी कुंज,
भारतीय प्रौद्योकी संस्थान
रुड़की- 247 667 (उत्तराखण्ड)

 

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