हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है। - महात्मा गांधी।
 
खेलो रंग अबीर उडावो - होली कविता  (काव्य)       
Author:अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' | Ayodhya Singh Upadhyaya Hariaudh

खेलो रंग अबीर उड़ावो लाल गुलाल लगावो ।
पर अति सुरंग लाल चादर को मत बदरंग बनाओ ।
न अपना रग गँवाओ ।

जनम-भूमि की रज को लेकर सिर पर ललक चढ़ाओ ।
पर अपने ऊँचे भावो को मिट्टी में न मिलाओ ।
न अपनी धूल उड़ाओ ।

प्यार उमंग रंग में भीगो सुन्दर फाग मचाओ ।
मिलजुल जी की गांठे खोलो हित की गांठ बँधाओ ।
प्रीति को बेलि उगाओ ।

- पं० अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'

 

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