भाषा विचार की पोशाक है। - डॉ. जानसन।
 

लोक-कथाएं

क्षेत्र विशेष में प्रचलित जनश्रुति आधारित कथाओं को लोक कथा कहा जाता है। ये लोक-कथाएं दंत कथाओं के रूप में एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में प्रचलित होती आई हैं। हमारे देश में और दुनिया में छोटा-बड़ा शायद ही कोई ऐसा हो, जिसे लोक-कथाओं के पढ़ने या सुनने में रूचि न हो। हमारे देहात में अभी भी चौपाल पर गांववासी बड़े ही रोचक ढंग से लोक-कथाएं सुनते-सुनाते हैं। हमने यहाँ भारत के विभिन्न राज्यों में प्रचलित लोक-कथाएं संकलित करने का प्रयास किया है।

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चोर और राजा - लक्ष्मीनिवास बिडला

किसी जमाने में एक चोर था। वह बड़ा ही चतुर था। लोगों का कहना था कि वह आदमी की आंखों का काजल तक उड़ा सकता था। एक दिन उस चोर ने सोचा कि जबतक वह राजधानी में नहीं जाएगा और अपना करतब नहीं दिखाएगी, तब तक चोरों के बीच उसकी धाक नहीं जमेगी। यह सोचकर वह राजधानी की ओर रवाना हुआ और वहां पहुंचकर उसने यह देखने के लिए नगर का चक्कर लगाया कि कहां क्या कर सकता है।

 
गुड्डा गुड़िया - गिजुभाई

एक राजा था । उसकी एक बेटी थी। राजा ने अपनी बेटी का ब्याह एक दूसरे राजा के साथ कर दिया। राजा ने जब राजकुमारी को कहारों के साथ डोली में ससुराल भेजा, तो उसके साथ एक दासी भेजी। रास्तें में दोपहर के समय, डोली वाले कहार खाने-पीने के लिए एक नदी के किनारे रुके। राजकुमारी का नियम था कि वह रोज नहाने के बाद ही भोजन करती थी। इसलिए वह अपनी दासी के साथ नदी पर नहाने गई। इधर राजकुमारी अपने कपड़े उतार नदी में नहाने लगी, उधर दासी राजा की बेटी के कपड़े पहनकर रथ में जा बैठी, और खाना-पीना जल्दी से निपटाकर रथ के साथ आगे बढ़ गई।

 

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