हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। - राजेंद्रप्रसाद।
 

विविध

विविध, Hindi Miscellaneous

Article Under This Catagory

कहानी गिरमिट की - रोहित कुमार 'हैप्पी' | न्यूज़ीलैंड

फीज़ी में अनुबंधित श्रम 

 
एक यांत्रिक संतान  - डॉ सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त

उसकी कोख में बच्ची थी। अब आप पूछेंगे कि मुझे कैसे पता? कहीं डॉक्टरों को खिला-पिलाकर मालूम तो नहीं करवा लिया! यदि मैं कहूँ कि उसकी कोख में बच्चा था, तब निश्चित ही आप इस तरह का सवाल नहीं करते। आसानी से मान लेते। हमारे देश में लिंग भेद केवल व्याकरण तक सीमित है। वैचारिक रूप से हम अब भी पुल्लिंगवादी हैं। खैर जो भी हो उसकी कोख में बच्चा था या बच्ची यह तो नौ महीने बाद ही मालूम होने वाला था। चूंकि पहली संतान होने वाली थी सो घर की बुजुर्ग पीढ़ी खानदान का नाम रौशन करने वाले चिराग की प्रतीक्षा कर रही थी। वह क्या है न कि कोख से जन्म लेने वाली संतान अपने साथ-साथ कुछ न दिखाई देने वाले टैग भी लाती हैं। मसलन लड़का हुआ तो घर का चिराग और लड़की हुई तो घर की लक्ष्मी। कोख का कारक पुल्लिंग वह इस बात से ही अत्यंत प्रसन्न रहता है कि उसके साथ पिता का टैग लग जाएगा, जबकि कोख की पीड़ा सहने वाली ‘वह’ माँ बाद में बनेगी, सहनशील पहले।

 
फीजी के प्रवासी भारतीय साहित्यकार प्रो. बृज लाल की दृष्टि - सुभाषिनी लता कुमार | फीजी

अकादमिक स्वर्गीय प्रो. बृज लाल का नाम फीजी तथा दक्षिण प्रशान्त महासागर के प्रतिष्ठित साहित्यकारों की अग्रीम श्रेणी में लिया जाता है। उनके पूर्वज गिरमिटिया मजदूर के रूप में सन् 1908 में भारत से लगभग 12000 हजार किलोमीटर दूर फीजी द्वीप आकर बस गए। प्रो. बृजलाल के उत्थान की कहानी फीजी के एक साधारण गाँव के स्कूल ‘ताबिया सनातन धर्म’ से शुरू होती है। उन्होंने अपनी शिक्षा और कड़ी मेहनत के बल पर ऑस्ट्रेलियन राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में प्रशांत और एशियाई इतिहास के एमेरिटस प्रोफेसर का पद संभाला तथा अपने लेखन के माध्यम से प्रवासी भारतीयों के इतिहास को रचनात्मक रूप प्रदान किया है।

 
पत्रकार, आज़ादी और हमला - प्रो. राजेश कुमार

मास्टर अँगूठाटेक परेशानी की हालत में इधर से उधर फिर रहे थे, जैसे कोई बहुत ग़लत घटना हो गई हो, और वे उसे सुधारने के लिए भी कुछ न कर पा रहे हों।

“क्यों परेशान घूम रहे हो? ऐसा क्या हो गया?" लतीपतीराम ने पूछा।

 
प्रश्नचिह्न  - लतीफ घोंघी

प्रश्नवाचक चिह्न पर उनकी बड़ी आस्था है। उनकी ऐसी मान्यता है कि अपने देश की सार्थक भाषा है तो प्रश्नवाचक चिह्न की भाषा। उनकी आदत है कि हर स्थिति के पीछे वे एक प्रश्नवाचक चिह्न जरूर लगा देते हैं। इससे दो फायदे हैं। पहला यह कि लोगों को पता चलता है कि इस आदमी का अध्ययन और चिंतन-मनन तगड़ा है और दूसरा यह कि एक प्रश्नवाचक के लग जाने से उस स्थिति के अनेक नये कोण पैदा हो जाते हैं। जैसे आपने लिखा--प्रधान मंत्री। वे उसके पीछे प्रश्नवाचक चिह्न लगा देंगे। आपने लिखा--त्रिपाठी। वे उसके पीछे प्रश्नवाचक चिह्न लगा देंगे।

 
माँ तो आखिर माँ होती है - रश्मि चौधरी ‘प्रभास’

माँओं का काम ही क्या है? रोज सुबह मुर्गे की बांग के साथ ही उठाने लगती हैं बच्चों को। हमेशा ही सात बजे को नौ बजा बताती हैं और भोर को दोपहर बताती हैं।  बच्चों ने भी वर्षों से सुन-सुनकर अपने दिल और दिमाग को न केवल उसी ढंग से फिक्स कर लिया है बल्कि उसी ढंग की बॉडी क्लॉक भी बना ली है भीतर ही भीतर। चादर में लिपटे उनके ऊंघते हुए कान सुनते हैं कि अच्छा दोपहर है तब तो और सोना है। अच्छा नौ बज गए तो अभी थोड़ी देर और सही। माँ  कहती है कि जीवन पंछियों की भांति होना चाहिए शाम होते ही शयनकक्ष में और भोर होते ही डाली-डाली चीं-चीं–चूं-चूं और तिनका-भुनगा टैं-टैं –टूं-टूं।  ऐसे में माँ  जुगत लगाती है कि कैसे हमारे लाड़ले भारत कुमार को उठाया जाए।  चार पांच छेदों से सुशोभित ढक्कन वाली बोतल पानी से भर कर रात में याद से फ्रिज में रख देती है कि उससे भारत पर सुबह-सुबह बौछार की जा सके लेकिन बौछार भी निराश होकर धम्म से धरती पर बैठ जाती है। अगली जुगत पंखा, कूलर बंद करने की है लेकिन खर्राटे लेते भारत पर कोई असर नहीं। तरह-तरह के पकवान की सुगंध और नाक में चिड़िया के पंख से गुदगुदी भी बेकार पड़ जाती है। खैर! वह अपने भारत को दशकों से समझाती रही थी कि देखो गलत लोगों को दोस्त मत बनाना।

 
मौन के क्षण | बातें देश-विदेश की - विनीता तिवारी

1997 में जब अमेरिका आई तो कुछ वर्ष घर की ज़िम्मेदारियों को सम्भालने और कुछ यहाँ के हिसाब से जीवन शैली को व्यवस्थित करने में निकल गये। फिर बच्चों एवं परिवार को प्राथमिकता देते हुए बैंक में पार्ट टाइम काम करना शुरू किया। जब बच्चे स्कूल जाने लगे तो सोचा कि बैंक की नौकरी छोड़कर विद्यालय में ही नौकरी कर ली जाए ताकि बच्चों के साथ सर्दी-गर्मी की छुट्टियों का आनंद उठाया जा सके और उन्हें इधर उधर डे केयर में भी नहीं छोड़ना पड़े। बात जब दिमाग़ में बैठ गई तो कुछ दिनों पश्चात् उसका क्रियान्वयन भी हो गया। चंद परीक्षाओं एवं साक्षात्कारों से सफलतापूर्वक गुजरने के बाद एक उच्च-माध्यमिक विद्यालय में पर्मानैंट सब्स्टिट्यूट टीचर की नौकरी सुनिश्चित हुई।

 
कविगुरू रबीन्द्रनाथ ठाकुर  - नरेन्द्र देव

कविगुरु रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने साहित्य के क्षेत्र में अपनी जन्मभूमि बंगाल में शुरूआती सफलता प्राप्त की। वह साहित्य की सभी विधाओं में सफल रहे किन्तु सर्वप्रथम वह एक महान कवि थे। अपनी कुछ कविताओं के अनुवादों के साथ वह पश्चिमी देशों में  भी प्रसिध्द हो गए। कविताओं की अपनी पचास और अत्यधिक लोकप्रिय पुस्तकों में से मानसी (1890), (द आइडियल वन), सोनार तरी (1894), (द गोल्डेन बोट) और गीतांजलि (1910) जिस पुस्तक के लिये उन्हें वर्ष 1913 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

 
टैगोर - कवि, गीतकार, दार्शनि‍क, कलाकार और शि‍क्षा वि‍शारद - तड़ि‍त मुखर्जी

'प्रसन्‍न रहना तो बहुत सहज है, परन्‍तु सहज रहना बहुत कठि‍न' ‑ रवीन्‍द्रनाथ टैगोर

 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश