हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। - राजेंद्रप्रसाद।
 

बाल-साहित्य

बाल साहित्य के अन्तर्गत वह शिक्षाप्रद साहित्य आता है जिसका लेखन बच्चों के मानसिक स्तर को ध्यान में रखकर किया गया हो। बाल साहित्य में रोचक शिक्षाप्रद बाल-कहानियाँ, बाल गीत व कविताएँ प्रमुख हैं। हिन्दी साहित्य में बाल साहित्य की परम्परा बहुत समृद्ध है। पंचतंत्र की कथाएँ बाल साहित्य का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। हिंदी बाल-साहित्य लेखन की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। पंचतंत्र, हितोपदेश, अमर-कथाएँ व अकबर बीरबल के क़िस्से बच्चों के साहित्य में सम्मिलित हैं। पंचतंत्र की कहानियों में पशु-पक्षियों को माध्यम बनाकर बच्चों को बड़ी शिक्षाप्रद प्रेरणा दी गई है। बाल साहित्य के अंतर्गत बाल कथाएँ, बाल कहानियां व बाल कविता सम्मिलित की गई हैं।

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मिठाईवाली बात  - अब्दुलरहमान ‘रहमान'

मेरे दादा जी हे भाई,
ले देते हैं नहीं मिठाई।
आता है हलवाई जब जब,
उसे भगा देते हैं तब तब॥

 
जीवन में नव रंग भरो - त्रिलोक सिंह ठकुरेला

सीना ताने खड़ा हिमालय,
कहता कभी न झुकना तुम।
झर झर झर झर बहता निर्झर,
कहता कभी न रुकना तुम॥

 
अच्छा कौन? - अकबर बीरबल के किस्से

एक दिन बादशाह अकबर अपने दरबार में बैठा हुआ दरबारियों से दिल-बहलाव कर रहा था, इसी बीच बीरबल भी आ पहुँचा! बादशाह ने बीरबल से पूछा-- बीरबल!क्या बतला सकते हो कि फल कौनसा अच्छा? दूध किसका अच्छा, पत्ता किसका अच्छा, फूल कौन सा अच्छा, मिठास कौन सी अच्छी, राजा कौन अच्छा ?

 
गुरु और चेला - सोहन लाल द्विवेदी

गुरु ने कहा किंतु चेला न माना,
गुरु को विवश हो पड़ा लौट जाना।
गुरुजी गए, रह गया किंतु चेला,
यही सोचता हूँगा मोटा अकेला।

चला हाट को देखने आज चेला,
तो देखा वहाँ पर अजब रेल-पेला।
टके सेर हल्दी, टके सेर जीरा,
टके सेर ककड़ी टके सेर खीरा।

टके सेर मिलती थी रबड़ी मलाई,
बहुत रोज़ उसने मलाई उड़ाई।
सुनो और आगे का फिर हाल ताज़ा।
थी अंधेर नगरी, था अनबूझ राजा।

बरसता था पानी, चमकती थी बिजली,
थी बरसात आई, दमकती थी बिजली।
गरजते थे बादल, झमकती थी बिजली,
थी बरसात गहरी, धमकती थी बिजली।

गिरी राज्य की एक दीवार भारी,
जहाँ राजा पहुँचे तुरत ले सवारी।
झपट संतरी को डपट कर बुलाया,
गिरी क्यों यह दीवार, किसने गिराया?

कहा संतरी ने-महाराज साहब,
न इसमें खता मेरी, ना मेरा करतब!
यह दीवार कमजोर पहले बनी थी,
इसी से गिरी, यह न मोटी घनी थी।

खता कारीगर की महाराज साहब,
न इसमें खता मेरी, ना मेरा करतब!
बुलाया गया, कारीगर झट वहाँ पर,
बिठाया गया, कारीगर झट वहाँ पर।

कहा राजा ने-कारीगर को सजा दो,
खता इसकी है आज इसको कज़ा दो।
कहा कारीगर ने, ज़रा की न देरी,
महाराज! इसमें खता कुछ न मेरी।

यह भिश्ती की गलती यह उसकी शरारत,
किया गारा गीला उसी की यह गफ़लत।
कहा राजा ने-जल्द भिश्ती बुलाओ।
पकड़ कर उसे जल्द फाँसी चढ़ाओ।

चला आया भिश्ती, हुई कुछ न देरी,
कहा उसने-इसमें खता कुछ न मेरी।
यह गलती है जिसने मशक को बनाया,
कि ज़्यादा ही जिसमें था पानी समाया।

मशकवाला आया, हुई कुछ न देरी,
कहा उसने इसमें खता कुछ न मेरी।
यह मंत्री की गलती, है मंत्री की गफ़लत,
उन्हीं की शरारत, उन्हीं की है हिकमत।

बड़े जानवर का था चमड़ा दिलाया,
चुराया न चमड़ा मशक को बनाया।
बड़ी है मशक खूब भरता है पानी,
ये गलती न मेरी, यह गलती बिरानी।

है मंत्री की गलती तो मंत्री को लाओ,
हुआ हुक्म मंत्री को फाँसी चढ़ाओ।
चले मंत्री को लेके जल्लाद फ़ौरन,
चढ़ाने को फाँसी उसी दम उसी क्षण।

मगर मंत्री था इतना दुबला दिखाता,
न गर्दन में फाँसी का फंदा था आता।
कहा राजा ने जिसकी मोटी हो गर्दन,
पकड़ कर उसे फाँसी दो तुम इसी क्षण।

चले संतरी ढूँढ़ने मोटी गर्दन,
मिला चेला खाता था हलुआ दनादन।
कहा संतरी ने चलें आप फ़ौरन,
महाराज ने भेजा न्यौता इसी क्षण।

बहुत मन में खुश हो चला आज चेला,
कहा आज न्यौता छकूँगा अकेला!!
मगर आके पहुँचा तो देखा झमेला,
वहाँ तो जुड़ा था अजब एक मेला।

यह मोटी है गर्दन, इसे तुम बढ़ाओ,
कहा राजा ने इसको फाँसी चढ़ाओ!
कहा चेले ने-कुछ खता तो बताओ,
कहा राजा ने-‘चुप’ न बकबक मचाओ।

मगर था न बुद्धू-था चालाक चेला,
मचाया बड़ा ही वहीं पर झमेला!!
कहा पहले गुरु जी के दर्शन कराओ,
मुझे बाद में चाहे फाँसी चढ़ाओ।

गुरुजी बुलाए गए झट वहाँ पर,
कि रोता था चेला खड़ा था जहाँ पर।
गुरु जी ने चेले को आकर बुलाया,
तुरत कान में मंत्र कुछ गुनगुनाया।

झगड़ने लगे फिर गुरु और चेला,
मचा उनमें धक्का बड़ा रेल-पेला।
गुरु ने कहा-फाँसी पर मैं चढूंगा,
कहा चेले ने-फाँसी पर मैं मरूँगा।

हटाए न हटते अड़े ऐसे दोनों,
छुटाए न छुटते लड़े ऐसे दोनों।
बढ़े राजा फ़ौरन कहा बात क्या है?
गुरु ने बताया करामात क्या है।

चढ़ेगा जो फाँसी महूरत है ऐसी,
न ऐसी महूरत बनी बढ़िया जैसी।
वह राजा नहीं, चक्रवर्ती बनेगा,
यह संसार का छत्र उस पर तनेगा।

कहा राजा ने बात सच गर यही
गुरु का कथन, झूठ होता नहीं है
कहा राजा ने फाँसी पर मैं चढूँगा
इसी दम फाँसी पर मैं ही टँगूँगा।

चढ़ा फाँसी राजा बजा खूब बाजा
प्रजा खुश हुई जब मरा मूर्ख राजा
बजा खूब घर-घर बधाई का बाजा।
थी अंधेर नगरी, था अनबूझ राजा

-सोहन लाल द्विवेदी

 
चतुर खरगोश  - पंचतंत्र

एक बड़े से जंगल में शेर रहता था। शेर बहुत गुस्सैल था। सभी जानवर उससे बहुत डरते थे। वह सभी जानवरों को परेशान करता था। वह आए दिन जंगलों में पशु-पक्षियों का शिकार करता था। शेर की इन हरकतों से सभी जानवर चिंतित थे।

 
बुद्धिमान हंस - पंचतंत्र

एक विशाल वृक्ष था। उसपर बहुत से हंस रहते थे। उनमें एक वृद्ध बुद्धिमान और दूरदर्शी हंस था। उसका सभी हंस आदर करते थे। एक दिन उस वृद्ध हंस ने वृक्ष की जड के निकट एक बेल देखी। बेल उस वृक्ष के तने से लिपटना शुरू कर चुकी थी। इस बेल को देखकर वृद्ध हंस ने कहा, देखो, बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सभी के लिए संकट बन सकती है।

 
बच्चों के लिए चिट्ठी  - मंगलेश डबराल

प्यारे बच्चों हम तुम्हारे काम नहीं आ सके। तुम चाहते थे हमारा क़ीमती समय तुम्हारे खेलों में व्यतीत हो। तुम चाहते थे हम तुम्हें अपने खेलों में शरीक करें। तुम चाहते थे हम तुम्हारी तरह मासूम हो जाएँ।

 
कपटी मित्र  - सीताराम | बाल कहानी
मगध देश में चम्पकवती नाम का एक वन हैं,  वहाँ बहुत दिनों से एक हिरन और एक कौवा बड़े स्नेह से रहते थे। एक दिन हिरन इधर-उधर टहल रहा था। उसे एक सियार ने देखा। सियार ने विचारा, “अरे, इसके सुन्दर मांस को कैसे खायें ? अच्छा चलो, पहले मेल करके विश्वास तो करावें।”  ऐसा सोच उसके पास जाकर बोला, “मित्र अच्छे हो?  हिरन ने पूछा, “तुम कौन हो?  सियार बोल, मैं क्षुद्र-बद्धि नाम का सियार हूँ। इस वन में बिना किसी मित्र के अकेला मरे की नाईं रहता हूँ। अब तुमको मित्र पाके फिर से मेरा जन्म होगा। अब तो में सदा तुम्हारे साथ रहूँगा।” मृग ने कहा, “बहुत अच्छा।“

जब सूर्यनारायण अस्त हो गए, तो दोनों हिरन के कुंज में गए। वहाँ चम्पा की डार पर हिरन का पुराना मित्र सुबुद्धि नाम का काऊवा बैठा हुआ था। इन दोनों को देख, उसने पूछा, “यह कौन है?” हिरन ने कहा, “यह एक सियार है, हम लोगों से मिताई करने आया है।” कौवे ने कहा, “भाई, अकस्मात्‌ आनेवाले के साथ मिताई नहीं की जाती। यह काम तुमने अच्छा नहीं किया।” इतना सुनते ही सियार लाल-लाल आँखें करके बोला, “जब तुम्हारी हिरन की पहली भेंट हुई थी, तब तुम भी ऐसे ही थे। तुम्हारे साथ केसे आज तक प्रीति दिन-दिन बढ़ती जाती है? जैसे हिरन हमारा मित्र है, वैसे ही तुम भी।“  हिरन ने कहा, “इस बकवाद से क्‍या मिलेगा? आओ सब कोई इकट्ठे चैन से बातचीत करें।“  कौवा बोला, “अच्छा।” सबेरे सब इधर-उधर चले गए।

एक दिन सियार ने हिरन से चुपके से कहा, “भाई, इसी वन की एक ओर अनाज से भरापूरा एक खेत है, चलो तुम्हें दिखा दें।” मृग ने जो खेत देख लिया, तो नित वहीं जाकर अनाज चरा करता। एक दिन किसान ने हिरन को देख लिया और जाल फैला दिया। हिरन जो आया, वो जाल में फँस गया और सोचने लगा,  “इस काल की फाँसी ऐसे जाल से सिवाय मित्र के और कौन छुड़ा सकता है?” इतने ही में सियार भी वहाँ आ पहुंचा और हिरन को देख, सोचने लगा, “मेरा छल सफल हो गया। अब मनोरथ भी परा होगा;  क्योंकि जब यह काटा जाएगा, तो इसकी बोटियाँ हमें खाने को मिलेंगी। हिरन उसे देख खुशी से फूल गया और बोला, “भाई, मेरे बंधन काट दो। मुझे छुड़ाओ। अब देर न करो।”

सियार ने जाल को बार-बार देखकर विचारा कि हिरन तो कठिन बन्धन में बांध गया है। वह बोला, “भाई, जाल ताँत का बना है। इसमें इतवार के दिन दाँत कैसे लगाऊँ? तुम अपने मन में और कुछ मत समझना, सवेरे जो कहोगे, वही करूँगा।” जब साँझ हो गई और हिरन न आया, तो कौवा भी उसे ढूँढता हुआ वहीं आ पहुँचा और हिरन को उस दशा में देख के बोला, “भाई, यह क्या हुआ? हिरन ने कहा,  “भाई, हित की बात न मानने का फल। कौवे ने कहा,  “वह सियार कहाँ है? हिरन बोला, मेरे मांस के लालच में यहीं-कहीं होगा। कौवे ने कहा, मैंने तो  तुमसे पहले ही कहा था।” तब कोकौवा लम्बी साँस लेके बोला, “अरे दगाबाज़ पापी, तूने यह क्या किया?” सबेरे किसान को लाठी लेकर उसी ठाँव आते देख, कौवे ने कहा, “भाई हिरन, तुम अपना पेट फुला और हाथ पेर ढीले कर, मरे जैसे बन जाओ। जब में चिल्लाऊँ, तो तुम तुरन्त उठके भाग जाना।” कौबे की बात पर हिरन वैसा ही बन गया। किसान हिरन को मरा जान हँस के बोला, “अरे, यह तो आप ही मर गया।”  इतना कह वह हिरन को खोल जाल बटोरने लगा। जब किसान कुछ दूर चला गया, तो कौवा चिल्लाया और हिरन झटपट उठके भाग गया। किसान ने लाठी चलाई, वह सियार के लगी और वह मर गया।

-सीताराम
[साहित्य संग्रह]
 
गर्मी की छुट्टियाँ - अमृता गोस्वामी

गर्मी की लो आ गईं छुट्टियाँ
करो खूब सब मिलकर मस्तियाँ।

 
मत बाँटो इंसान को | बाल कविता - विनय महाजन

मंदिर-मस्जिद-गिरजाघर ने
बाँट लिया भगवान को।
धरती बाँटी, सागर बाँटा
मत बाँटो इंसान को॥

 

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