कैसे निज सोये भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा। - हरिऔध।
 
मैं दिल्ली हूँ | तीन (काव्य)       
Author:रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi

गूंजी थी मेरी गलियों में, भोले बचपन की किलकारी ।
छूटी थी मेरी गलियों में, चंचल यौवन की पिचकारी ॥

सावन मेरे गलियारों में, झूले पर बैठा आता था ।
फागुन मेरे बागीचों में, मदमस्त जवानी लाता था ॥

सूरज की हर मासूम किरण, आकर मुझको दुलराती थी ।
आती थी रात सितारों के, गज़रे मुझको पहनाती थी ॥

खुशियाँ हर ओर विचरती थीं, सुख भीतर था सुख; बाहर था ।
मेरे घर छोटे और बड़े, सबका सम्मान बराबर था ॥

मेरा स्वामी था धर्म, पढ़ाया था मुझको सच्चाई ने ।
मुझको भाषा सिखलाई थी, 'दिल' जैसे प्यारे भाई ने ॥

संगीत मुझे दुलराता था, गीतों ने मुझे जवानी दी ।
कविता ने मुझको न्याय, कला ने जीवन भरी निशानी दी ॥

संघर्षों की रामायण हूँ, उस 'कीली' की हम जोली में ।
जो लोहे वाली लाट गढ़ी है, अब तक भी महरौली में ॥

यह सही कि इसको मुझे, बसाने वाले ने गढ़वाया था ।
गढ़वाकर कीली मुझे अमर, रखने का बीड़ा खाया था ॥

- रामावतार त्यागी

 

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