कैसे निज सोये भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा। - हरिऔध।
 
कभी कभी खुद से बात करो | कवि प्रदीप की कविता (काव्य)       
Author:भारत-दर्शन संकलन | Collections

कभी कभी खुद से बात करो, कभी खुद से बोलो ।
अपनी नज़र में तुम क्या हो? ये मन की तराजू पर तोलो ।
कभी कभी खुद से बात करो ।
कभी कभी खुद से बोलो ।

हरदम तुम बैठे ना रहो - शौहरत की इमारत में ।
कभी कभी खुद को पेश करो आत्मा की अदालत में ।
केवल अपनी कीर्ति न देखो- कमियों को भी टटोलो ।
कभी कभी खुद से बात करो ।
कभी कभी खुद से बोलो ।

दुनिया कहती कीर्ति कमा के, तुम हो बड़े सुखी ।
मगर तुम्हारे आडम्बर से, हम हैं बड़े दु:खी ।
कभी तो अपने श्रव्य-भवन की बंद खिड़कियाँ खोलो ।
कभी कभी खुद से बात करो ।
कभी कभी खुद से बोलो ।

ओ नभ में उड़ने वालो, जरा धरती पर आओ ।
अपनी पुरानी सरल-सादगी फिर से अपनाओ ।
तुम संतो की तपोभूमि पर मत अभिमान में डालो ।
अपनी नजर में तुम क्या हो? ये मन की तराजू में तोलो ।
कभी कभी खुद से बात करो ।
कभी कभी खुद से बोलो ।

- कवि प्रदीप

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