भाषा का निर्माण सेक्रेटरियट में नहीं होता, भाषा गढ़ी जाती है जनता की जिह्वा पर। - रामवृक्ष बेनीपुरी।
गुर्रमकोंडा नीरजा की कविताएं  (काव्य)  Click to print this content  
Author:गुर्रमकोंडा नीरजा

तीन शब्द

तीन शब्द----
हाँ! तीन ही शब्द

नफरत!
शक!!
डर!!!

बोए और काटे जा रहे हैं हर वक्त
रिश्तों की जड़ों में सींचकर ज़हर!

--- डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा 


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खबरदार!

तुम रक्षक हो या भक्षक?
मासूमों की चीख सुनकर भी
तुम्हारे कण नहीं खुलते!

कब तक बहलाओगे
झूठी कहानियों से?

शिकारी को छोड़कर
शिकार को लूट रहे हो !
इन्साफ माँगने वालों को सजा दे रहे हो?

सारे शिकार एकजुट हो रहे हैं,
तुम्हारे खिलाफ बगावत तय है!

- डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा 
  सह-संपादक 'स्रवंति' 
  असिस्टेंट प्रोफेसर

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