यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है। - शिवनंदन सहाय।

विक्रम का सिंहासन (विविध)

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Author: श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी

ज्यों--ज्यों भारत में धन-धान्य बढ़ता गया, त्यों-त्यों विदेशियों की ललचाई आँखें इसकी ओर दौड़ने लगीं। ग्रीकों की आफत दूर हुई, तो कुछ दिनों के बाद मध्य एशिया की दो जातियों ने भारत पर धावे पर धावे करना शुरू किया।

वे हूण और शक के नाम से मशहूर हैं। वे बड़े खूँखार, बड़े भयानक थे। लोगों को लूटते, कत्ल करते, गाँवों को, शहरों को जलाकर खाक बना देते खून की होली खेलने में उन्हें मजा आता। उनकी इस नई आफत से जिन्होंने भारत को बचाया, उन्हें भारत की जनता ने विक्रमादित्य की उपाधि दी। विक्रमादित्य – जिसका प्रताप सूरज की तरह चमके। पीछे कई प्रतापी राजाओं ने अपने नाम के साथ इस उपाधि को जोड़ा। पंद्रह विक्रमादित्यों की चर्चा हमारे इतिहास में है।

किंतु उनमें दो प्रसिद्ध हैं—एक मालवा के विक्रम जो कहानियों के राजा भरथरी के भाई थे, और दूसरे पाटलिपुत्र के चंद्रगुप्त द्वितीय।

भरथरी जब संन्यासी हो गए, विक्रम उनकी जगह उज्जयिनी की गद्दी पर बैठे। उन्हीं का चलाया हुआ विक्रम संवत है। विक्रम ने भारत के उत्तर-पश्चिम कोने से आते हुए विदेशियों के धावों को ही, उन्हें बहुत दूर तक खदेड़ भी दिया। पंचानबे शक सेनापतियों को उन्होंने तलवार के घाट उतारा था।

विक्रम बड़े योद्धा ही नहीं थे, बड़े न्यायी, बड़े उदार और बड़े गुणज्ञ भी थे।

विक्रम का सिंहासन, न्याय का सिंहासन समझा जाता था। उनके न्याय की कहानियाँ आज भी लोगों की जिह्वाओं पर हैं।

विक्रमादित्य ने अपने दरबार में नौ बड़े-बड़े विद्वानों को एकत्र कर रखा था, जो नव रत्न कहलाते थे। उन नवरत्नों में कालिदास का स्थान सबसे ऊँचा था।

भारत का नाम संसार के इतिहास में जिन लोगों के चलते आदर का स्थान पाएगा, उनमें कालिदास भी हैं। कालिदास की कविता पर मुग्ध होकर विक्रमादित्य ने अपना आधा राज्य उन्हें दे दिया था, ऐसा कहा जाता है।

कालिदास की कविता पर कितने ही राज्य न्योछावर किए जा सकते हैं। कालिदास की 'शकुंतला' को पढ़कर जर्मनी का प्रसिद्ध कवि गेटे – 'सुंदर', 'अति सुंदर' कहकर चिल्ला उठा था। कालिदास का मेघदूत कल्पना की उड़ान के आखिरी छोर पर जा पहुँचा है। विक्रमादित्य की उपाधि पानेवाले यह चंद्रगुप्त ग्रीक विजेता चंद्रगुप्त से चार-पाँच सौ साल बाद हुए। शकों का राज्य उस समय मालवा तक फैल गया था - 'शकों को भगाकर ही मैं दम लूँगा' – इस प्रतिज्ञा के साथ चंद्रगुप्त शक- विजय के लिए पाटलिपुत्र से रवाना हुए।

कल्पना कीजिए वह दृश्य!

पाटलिपुत्र से एक बड़ी सेना शकों को भारत से भगाने के लिए जा रही है। हाथी, घोड़े, रथ, पैदल- झुंड के झुंड, दल के दल। उनका नेतृत्व कर रहा है एक नौजवान ! रथ पर बैठा— तीर-धनुष लिये। सेना पश्चिम की ओर चलती है, फिर दक्षिण तरफ मुड़कर विंध्य को पार करती है। कितनी नदियाँ, कितनी घाटियाँ! अब मालवा की समतल भूमि—यहाँ एक -एक इंच के लिए खून की नदी बहाई जाती है।

और खून की उस बाढ़ में दुश्मन पीछे हटता जा रहा है। मालवा से गुजरात ! अब सामने अरब समुद्र लहरा रहा है। सेना रुकती है— आराम के लिए नहीं, जहाजों और नावों के इंतजाम के लिए।

अरब समुद्र को चीरते हुए बेड़े बढ़ते हैं, सौराष्ट्र से भी दुश्मनों को हटने को मजबूर करते हैं। तब दुश्मन उत्तर की ओर भागता है।

सिंधु को पार किया गया, सीमा पर्वतों की चोटियों को अब लाँघा जा रहा है।

पत्थर पर खून के धब्बे, बर्फ पर खून के धब्बे! और देखिए दुश्मन अपने खून की आखिरी बूंद देकर हमारे देश से सदा के लिए जा रहा है।

फिर सारा देश ‘चंद्रगुप्त विक्रमादित्य' की जय से क्यों न गूँज उठे? चंद्रगुप्त ने शकों को इस तरह भगाया कि फिर हिंदुस्तान की ओर देखने की हिम्मत उनमें न हुई ।

-श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी

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