अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। - भवानीदयाल संन्यासी।

चीनी बाबा (कथा-कहानी)

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Author: विद्या विंदु सिंह

चीनी बाबा हम छोटे बच्चों की राह हनुमानजी की तरह हाथ-पैर फैलाकर रोक लेते थे। हम लोग जिधर से कन्नी काटकर निकलना चाहें, वे हमसे पहले उधर पहुँच जाते थे। अगर पतली गली होती तो हम फँस जाते थे और बाबा पकड़कर प्यार की एक-एक चपत लगा देते थे। पर अगर अहाते में बाबा मिलते तो हम लोग बाबा को हरा देते थे। और कोई उनके बाएँ से तो कोई दाएँ से और कोई पाँवों के बीच से निकल जाता था। पाँवों के बीच से निकलने वाला बच्चा प्रायः बाबा की मोटी गुदगुदी पिंडलियों में दबकर पकड़ा जाता था, और बच्चों को अगल-बगल से भाग जाने में छूट मिल जाती थी। हम लोग बचकर भागते थे गाते हुए-- 'बाबा! चीनी खाएँगे।' बाबा हमें दौड़ाते और हम उतनी ही तेजी से भागते। चीनी बाबा के साथ का यह खेल आज भी स्मृति में हूबहू ताजा है।

बाबा का असली नाम क्या था, हमें नहीं मालूम। बाबा का 'चीनी बाबा' नाम कैसे पड़ा, यह भी नहीं पता। पर उनकी पत्नी चिनियाइन अइया से जब हमने पूछा तो बताने लगीं कि हमारी सास का कहना था कि ये जब पैदा हुए तो खूब गोरे, गोल-मटोल थे, आँखें छोटी-छोटी गोल-गोल थीं। और कोई परदेसी मेहमान उनके लिए चीनी गुड्डा खिलौना लाया था। उसे देखते ही उनकी बुआ ने कहा था, हमारा बाबू भी इसी चीनी गुड्डे की तरह है। और फिर उनको ‘चीनी' नाम से पुकारा जाने लगा था। उनका असली नाम हरिबख्स सिंह था। लेकिन यह नाम बहुत कम लोग जानते थे। खाली कागजों की लिखा पढ़ी में यह नाम था या पूजा-पाठ, श्राद्ध कर्म में यह नाम लिया जाता था। हाँ, विवाह संस्कार में भी भोर जगाते, सँझा जगाते समय यह नाम उनके मरने पर लिया जाता रहा।

बड़े होने पर, पूछने पर पता चला कि किसी बुजुर्ग ने बताया था कि अंग्रेजों के समय में चीनी और चाय का प्रचार करने के लिए प्रचारक गाँव-गाँव आते थे।

इनका घर गाँव में प्रवेश करते ही पहला घर था और दरवाजे पर अहाता भी बहुत बड़ा था, तो वहीं प्रचारक रुक जाते थे और पूरा गाँव वहीं एकत्र हो जाता था। बाबा छोटे थे तो उनको व्यापारी चीनी फाँकने को दे देते थे। वे बड़े प्रेम से चीनी फाँकते थे, इसलिए इनका नाम चीनी पड़ गया। इन्हीं के दरवाजे से गाँव में चीनी का प्रवेश हुआ था और गुड़ से ज्यादा चीनी लोकप्रिय हुई थी। इसलिए भी चीनी नाम उनके साथ पहले परिहास में, फिर आदतन जुड़ गया था, ऐसा लोगों का अनुमान है।

उनके दरवाजे के बड़े अहाते में लक्ष्मी पूजा होती थी, जिसमें प्रतिमा बनाने से लेकर सारी सजावट का दायित्व मेरे पिताजी को चीनी काका दिया करते थे। कोई महात्मा आ जाते तो सत्संग, कीर्तन, प्रवचन उन्हीं के अहाते में होता था।

विनोबा भावे की भूदान यात्रा यज्ञ में उन्हीं के द्वार पर उनका भाषण हुआ था। जय प्रकाश नारायणजी, लोहियाजी और आचार्य नरेंद्रदेव के भाषण भी वहाँ हुए थे, मेरे पिताजी बताया करते थे। उनका घर गाँव के कोने पर था। आते-जाते सब लोगों की रामजुहार लेते करते चीनी बाबा का वक्त कट जाता था।

चीनी भइया से चीनी काका, फिर चीनी बाबा की यह यात्रा चलती रही और उनकी पत्नी का नाम भी चिनियाइन भौजी, चिनियाइन काकी और चिनियाइन अइया का संबोधन उत्तरोत्तर पाता रहा। चीनी बाबा और चिनियाइन अइया दोनों ही बहुत धार्मिक प्रवृत्ति के थे ।

दोनों पति-पत्नी को कभी साथ बैठे किसी ने नहीं देखा था। चिनियाइन अइया घर के काम में रात-दिन जुटी रहती थीं। चीनी बाबा खेती-बाड़ी और गाँव-समाज के कामों में लगातार व्यस्त रहते थे। वे घर में केवल भोजन करने जाते थे। रात में बाहर की दालान में ही सोते थे। पहले के समाज में पति-पत्नी का साथ-साथ बैठना और बातें करना बेशर्मी मानी जाती थी। मेरी दादी बताती थीं कि पति-पत्नी परिवार के बड़ों और छोटों सबसे छिपकर रात में मिल पाते थे।

एक बार चिनियाइन अइया ने भी बताया था कि उस मिलने में जो सुख था, उसका अनुभव शायद रात-दिन साथ रहनेवाले दंपति कर ही नहीं सकते।

चीनी बाबा और चिनियाइन अइया दोनों ही बहुत कम बोलते थे। उनको अट्टहास करके हँसते हुए किसी ने नहीं देखा था। बहुत खुश हुए तो अधरों के कोने तनिक सा फैलकर स्मिति का आभास दे जाते थे।

बहुत दिनों के बाद एक पुत्र ने जन्म लिया था। उसके लाड़-प्यार में दंपति व्यस्त हुए और थोड़ा खुलकर हँसने लगे। पुत्र भी चीनी बाबा के हूबहू अनुकृति था। वैसे ही गोल-मटोल केवल रंग पर माँ का प्रभाव था, अतः कुछ साँवला था।

चीनी बाबा ने बेटे को पढ़ाया और वह प्राइमरी स्कूल में पहले मास्टर हुए, फिर हेड मास्टर हो गए।

बहू आई तो एकदम गोरी-चिट्टी, फूल सी कोमल, नाजुक बदन वाली। घर-गृहस्थी का कोई भी काम सँभाल पाना उसके लिए कठिन था। दिनभर आराम से बैठना या लेटना उसकी दिनचर्या थी ।

चिनियाइन अइया को किसी प्रकार की अमल नहीं थी, लेकिन बहू का पनडब्बा उसके सिरहाने के ताख में रखा रहता था और पलंग के नीचे पीकदान भी।

धीरे-धीरे चिनियाइन अइया ने समझ लिया कि इन तिलों से कोई तेल निकलने की उम्मीद नहीं है। सास-ससुर और पति तीनों ही गौआराशि (धेनु की राशि वाले अर्थात् बिल्कुल सीधे-सादे ) थे। चिनियाइन अइया घर से बाहर रात-दिन खटतीं, भागती-दौड़ती रहती थीं। पति और पुत्र दानों ही तेज तर्रार नहीं थे, इसलिए हलवाहा चरवाह भी काम में चोरी और मजूरी में सीनाजोरी करते रहते थे ।

चीनी बाबा का स्थूल शरीर अधिक भाग-दौड़ नहीं कर पाता था । पुत्र को स्कूल में पूरा समय देना पड़ता था, क्योंकि उनके पिता की शख्त हिदायत थी कि अध्यापक को अपने कर्तव्य पालन में पूरी तरह समर्पित होना चाहिए। क्योंकि यदि अध्यापक ही अपने कर्तव्य से तनिक भी विचलित हुआ तो अपने विद्यार्थियों को क्या शिक्षा देगा।

पुत्रवधू ने आरामतलबी और अनियमित दिनचर्या के कारण ऐसी बीमारी मोल ले ली, जिसका इलाज उस समय थोड़ा मुश्किल था। वैद्य की दवा या काढ़ा उसे कड़वा लगता था और वह पीती नहीं थी। धूप में तो वह निकलती ही नहीं थी। बंद कमरे में शुद्ध हवा कहाँ से मिलती ? चोरी के डर से बाहर की दीवार में खिड़की तक नहीं बनी थी। धीरे-धीरे बहू का गौर वर्ण श्वेत होता जा रहा था और शहर के डॉक्टर ने उसे तपेदिक का रोगी घोषित कर दिया। वैद्यजी ने भी कहा था कि बहू को थोड़ी खुली हवा और धूप में रहना चाहिए, नहीं तो इसे यक्ष्मा का राजरोग हो जाएगा। किंतु बहू रानी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था ।

अब बहू जब हँसती तो उसके पान और जर्दा से रँगे हुए दाँत सौंदर्य के स्थान पर वीभत्स लगते थे। हाथ-पैर की नसें नीली होकर उभरती जा रही थीं। इसी बीच पता चला कि वह गर्भवती है। जिस सूचना से मन प्रफुल्लित होकर नाच उठता, उसी सूचना ने चीनी बाबा को खुशी के साथ ही चिंता की गहरी खाई में धकेल दिया।

वैद्यजी के मना करने के बावजूद यह संयोग घटित हो चुका था। एक ओर पुत्र को यह छूत की बीमारी लगने का भय था तो दूसरी ओर आनेवाले बच्चे के लिए घोर चिंता की बात थी। साथ ही बहू की प्राणरक्षा कैसे होगी, इसके लिए भी वह दंपती चिंता कातर हो उठे थे।

चीनी बाबा ने पत्नी से कहकर बहू को बाहर बुलाया और उसे समझाने लगे- "बेटी! तुम दवा ठीक से खाया करो। नहीं खाओगी तो तुम्हारे बच्चे पर भी बुरा असर पड़ेगा। वैद्यजी बहुत अनुभवी हैं। उनके बताए अनुसार चलोगी तो खुद भी ठीक हो जाओगी और बच्चा भी स्वस्थ होगा।"

बहू की दुबली-पतली निर्बल काया हिचकियों से हिलने लगी थी और वह आँचल आँखों पर रखकर फफक-फफककर रोने लगी थी।

सास-ससुर दोनों ने उसे धीरज बँधाया और पुत्र को आदेश दिया कि आज से इसकी दवा और पथ्य को समय से देने की जिम्मेदारी तुम्हारी है। अब बहू की मनमानी नहीं चलेगी। हमारी भी गलती है कि हमने उसे इतने दिन मनमानी करने दी।

खैर, जो बीत गई सो बात गई, आगे हम सब मिलकर इसका ध्यान रखेंगे और इसे भी हमारी आज्ञा का पालन करते हुए सहयोग देना पड़ेगा।

सचमुच चमत्कार हुआ और वैद्यजी की दवा का प्रभाव कहिए या परिजनों की देखभाल का परिणाम, बहू स्वस्थ होने लगी। समय पर एक पुत्र ने जन्म लिया। माँ भी चार पाँच वर्ष में पूरी तरह ठीक हो गई।

चीनी बाबा और चिनियाइन अइया पोते के ऊपर न्योछावर थे। बच्चे के लिए बकरी का दूध वैद्यजी ने बताया था। बकरी खरीदकर आई थी। बच्चे के पालन-पोषण के लिए गाँव की एक स्त्री को लगा दिया गया था। बच्चे का नाम 'श्रीराम' रखा गया था। हरदम राम राम पुकारने की आदत रहने से अंत समय में राम का नाम मुँह से जरूर निकलेगा, ऐसा चीनी बाबा का विश्वास था ।

श्रीराम के जन्म की खुशी धूमधाम से मनाई गई। देवी भागवत का पाठ हुआ। एक कुंतल चावल और एक कुंतल गेहूँ दान में दिया गया। गाँव-गिराँव और नाते-रिश्तेदारों को भोज दिया गया।

चीनी बाबा वृद्ध हो चले थे, फिर भी खेती-बाड़ी का कुशल संचालन कर रहे थे। उनके अनुशासन और सहयोग भाव के कारण हरवाहा चरवाहा और मजदूर सभी इस परिवार के प्रति समर्पित भाव से काम करते थे। खेती में इतनी उपज होती थी कि खाने खिलाने के बाद भी काफी अनाज बेच दिया जाता था।

उस समय बैंक में जमा करने के स्थान पर लोग अपना धन सूद ब्याज पर दे देते थे। लेकिन चीनी बाबा ने जो कुछ भी उधार दिया, उसका सूद मिलने की कौन कहे, मूल भी डूब गया। उन्होंने ऐसे लोगों को उधार दिया था, जो अत्यंत आर्थिक कष्ट से विवश होकर उनसे उधार लेने आए थे।

चीनी बाबा उनकी आर्थिक स्थिति देखकर माँगने की हिम्मत ही नहीं कर पाते थे। कहाँ से देगा बेचारा ! यह सोचकर चुप रह जाते थे।

चीनी बाबा की स्थूल काया थी। अब वे चलते-चलते हाँफने लगते थे। एक दिन खेत में शौच के लिए गए तो लौटते समय जी घबड़ाने लगा और खेत की मेंड़ पर बैठ गए। अचानक उन्हें महसूस हुआ कि जैसे कलेजा मुँह को आ रहा है। वहीं मेंड़ पर लोट गए।

सुबह का समय था, लोग शौच से लौट रहे थे। देखा तो उठाकर घर ले आए। पर चीनी बाबा की आँखें बंद थीं। थोड़ी देर के बाद उन्होंने राम को पुकारा। राम को लेकर चिनियाइन अइया पहले से ही बदहवास सी खड़ी थीं। उनकी आँखों के सामने कर दिया। बाबा की आँखों ने राम को और चिनियाइन काकी की ओर निहारा और आँखें बंद कर लीं। वे इस संसार से मुक्त हो चुके थे।

चीनी बाबा के आँख मूँदते ही इस घर का वैभव, अनुशासन, प्रेम-भाव सब विदा होने लगे। उनके दरवाजे पर लगने वाली चौपाल कुछ दिन तक चली, जिसमें बाबा की यादें होतीं और उनके व्यवहार का बखान ।

फिर धीरे-धीरे उनके विछोह का दुःख कम होने लगा और लोग उन्हें भूलने लगे। जिन लोगों ने बाबा से सबसे छिपाकर कर्ज लिया था या बाबा ने अपनी ओर से ही मदद के लिए कुछ दिया था, वे लोग भी भूलने लगे, क्योंकि उसे याद रखना कर्जदार होने का गम पालना था और कभी मुँह से उनके एहसान की बात निकल जाए तो तगादा करनेवाले सिर पर सवार हो जाएँगे ।

चीनी बाबा ने चिनियाइन अड़या को भी अधिक नहीं बताया था, पर कुछ लोगों के नाम बताते हुए कहा था कि अगर मुझे कुछ हो जाए तो तुम घबराना नहीं, ये लोग तुम्हारी मदद करेंगे, क्योंकि वे मेरे एहसानमंद होंगे।

चिनियाइन अइया ने बारी-बारी से जरूरत पड़ने पर उन लोगों से बात की, जिनका नाम बाबा बता गए थे। उनमें से कुछ ने तो पैर छूकर माफी माँगते हुए कह दिया कि हम आपका एहसान मानते हैं, पर धन लौटाने की हैसियत हमारी नहीं है, उसे दान समझ लीजिए। हम आपकी सेवा जब तक जिएँगे, तब तक करेंगे।

कुछ लोग साफ मुकर गए। उनका कहना था कि बाबा ने मौके पर हमारी मदद की थी, पर हमने उनका कर्ज चुका दिया था। चिनियाइन अइया के पास कोई सबूत नहीं था और आज की दुनिया सच्चाई की नहीं, सबूत की माँग करती है। बेटा भोला शंकर नाम से ही नहीं, स्वभाव से भी भोला शंकर था । बहू स्वस्थ तो हो गई थी, पर शारीरिक श्रम करने की न उसे आदत थी, न शौक ।

चिनियाइन अइया घर से बाहर तक रात-दिन खटती रहती थीं।

मेरी दादी की वह अभिन्न सहेली थीं। दोनों हर पूर्णमासी को दिलाशी गंज या सिंगरिस (शृंगी ऋषि आश्रम) तक पैदल सरयू स्नान करने जाती थीं। मेरी दादी बीमार हुई और सरयू स्नान पूर्णिमा को नहीं जा सकीं तो चिनियाइन अइया भी नहीं गई।

अगली पूर्णमासी आने से पहले ही दादी स्वर्ग चली गईं। उनकी मृत देह से लिपटकर चिनियाइन अइया रोते हुए बोली थीं-- "आज अकेली ही सरयू तीर जा रही हो, तुमने भी साथ छोड़ दिया। " इसे दैवी संयोग कहें या अमर मैत्री कि उसी दिन चिनियाइन अइया का दमा बढ़ गया था और तब दमा का इलाज आसान नहीं था। लोग कहते थे कि दमा दम के साथ जाता है।

तीसरे ही दिन ठीक पूर्णिमा को चिनियाइन अइया भी बेटे और गाँववालों के कंधे पर सवार होकर सरयू तीर चल दी थीं। पोते श्रीराम का भी कंधा लगवा दिया गया था। चीनी बाबा और चिनियाइन अइया दोनों के चले जाने से सबकुछ बिखरने लगा था। मास्टर भोला शंकर ने खेती-बाड़ी अधिया पर दे दी।

श्रीराम को दूध पिलाने वाली दुलारी अहीरिन घर का काम-काज सँभालने लगी थी। श्रीराम की माँ फिर से अपने आलसीपन की ओर लौटने लगी थी। घर में क्या हो रहा है, घर से क्या जा रहा है, इन सबकी ओर उसका ध्यान ही नहीं जाता था। पति और पुत्र दोनों के स्कूल जाने के बाद वह चारपाई पर पड़ी रहती थी ।

दुलारी अहरिन इस घर को सँभालने से अधिक अपना घर भरने में ध्यान देने लगी थी। खाना बनाकर पूरे घर के लिए यहीं से भेजती थी। बच्चे आकर गिलास भर-भरकर दूध पी जाते थे। घी, दही, मट्ठा भी उस परिवार को चिकना कर रहा था।

हलवाहे चरवाहे भी मौज कर रहे थे। बाहर भोला शंकर और घर में उनकी नाजुक पत्नी दोनों ही असावधान थे। श्रीराम भूख लगने पर दुलारी के पास जाकर खड़ा हो जाता। वह देखता कि दूध की मलाई से भरा गिलास दुलारी का बेटा पी रहा है और उसका दूध पानी मिला हुआ है उसकी उदास आँखें बाबा और आजी की याद में भर आतीं। वह अकेले में हबस हबसकर रोता और आसमान की ओर निहारता । उसके पिता कहते थे कि बाबा-आजी ऊपर चले गए। उसका भोला मन इंतजार करता कि जैसे ऊपर से बेल, अमरूद और आम, जामुन के फल टपकते हैं, वैसे ही बाबा-आजी भी नीचे गिरेंगे। उसके भोले सवाल भोला शंकर को विह्वल कर देते और उसे छाती से लगाकर वह रो पड़ते।

पत्नी ने फिर से चारपाई पकड़ ली थी। धीरे-धीरे घर की लक्ष्मी रूठने लगी थी। पत्नी की दवा का खर्च भी जुटा पाना कठिन होने लगा था। वैद्यजी ने चिंता प्रकट करते हुए कह दिया था कि अब इनका उपचार मेरे वश में नहीं है। इनका क्षय रोग दोबारा लौट आया है और असाध्य हो गया है।

एक रात श्रीराम की माँ ने पति और बेटे को भीतर बुलवाया और बोली, "वैद्यजी ने जो कुछ भी कहा, दुलारी ने मुझे बता दिया है। मैं जान गई हूँ कि मुझे भी जल्दी ही जाना है । मेरी आपसे विनती है कि कोई अच्छी लड़की देखकर विवाह कर लेना, जो मेरे बच्चे को, आपको और इस घर को सँभाल सके। मुझे अब दुलारी पर भरोसा नहीं रहा।'' उस दिन श्रीराम माता-पिता को रोते देखकर जोर-जोर से रो पड़ा था। रोते-रोते अपनी तोतली भाषा में बच्चे ने जो कुछ कहा, उसका भाव था - "क्या अम्मा भी ऊपर चली जाएँगी? मैं इन्हें अकेले नहीं जाने दूँगा । हम दोनों ऊपर जाकर बाबा और दादी को अपने साथ वापस लाएँगे।"

भोला शंकर ने पत्नी और बच्चे को हृदय से लगाकर रोते हुए कहा था - "मैं किसी को अब नहीं जाने दूँगा । तुम्हारी माँ ठीक हो जाएँगी। मैं कल ही शहर के बड़े अस्पताल में तुम्हारी माँ को दिखाने ले जाऊँगा।" भोला शंकर को दुलारी पर क्रोध आया कि उसने वैद्यजी की बात राम की माँ को क्यों बता दी ?

दूसरे दिन गाँव का एक आदमी फूट-फूटकर रोते हुए बाबा के दरवाजे पर अपना सिर पटकने लगा था। वह कह रहा था कि बाबा, अइया! हमें माफ कर दो। हमने झूठ कहा था कि हम कर्जदार नहीं हैं। हमारे बच्चों को श्राप मत देना ।

लोग उसे उठाकर चुप करा रहे थे और कह रहे थे कि इसके सिर पर देवी माँ सवार हुई हैं और सच उगलवा रही हैं। उसने गमछे में बँधे हुए कुछ नोट भोला शंकर के चरणों में डाल दिए। भइया! भौजी को लेकर आप शहर चले जाएँ। मैं अपना खेत बेचकर भी और पैसा लेकर आऊँगा। आज मैंने रात में सपने में बाबा और अहया को रोते हुए देखा था। ऐसे देवता की आत्मा को धोखा देकर मैं चैन से मर भी नहीं पाऊँगा।

भोला शंकर को लगा कि सचमुच श्रीराम के बाबा-अइया धरती पर उतर आए हैं और इस आदमी के माध्यम से साहस और धीरज दे रहे हैं।

- विद्या विंदु सिंह

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