मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर। - चंद्रबली पांडेय।

सुब्रह्मण्य भारती : बीसवीं सदी के महान तमिल कवि (विविध)

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Author: डॉ. एस मुथुकुमार

देश के स्वाधीनता संग्राम में जहाँ कुछ देशभक्तों ने अपने तेजस्वी भाषणों, नारों से विदेशी सत्ता का दिल दहलाया, वहीं कुछ ऐसे साहित्यकार भी थे जिन्होंने अपने काव्य-बाणों से विपक्षी को आहत किया। हिंदी में यदि ‘मैथिलीशरण गुप्त‘, ‘सोहनलाल द्विवेदी‘, ‘सुभद्राकुमारी चौहान‘, ‘रामधारी सिंह ‘दिनकर‘ आदि ने अपनी काव्य-रचनाओं से भारतीय नवयुवकों के मन में देश-प्रेम के भाव भरे तो देश की अन्य भाषाओं में भी ऐसे देशभक्त कवि, साहित्यकार हुए जिनकी रचनाओं ने अँग्रेजी राज्य की जड़ें हिला दीं। तमिल भाषा के ऐसे ही कवि थे ‘सुब्रह्मण्य भारती‘।

सुब्रह्मण्य भारती बीसवीं सदी के महान तमिल कवि थे। उनका नाम भारत के आधुनिक इतिहास में एक उत्कट देशभक्त के रूप में लिया जाता है। देश के स्वतंत्रता-संग्राम के लिए उन्होंने जिस शस्त्र का प्रयोग किया, वह था उनका लेखन, विशेषतः कविता।

सुब्रह्मण्य भारती का जन्म तमिलनाडु में एक मध्यवर्गीय परिवार में 11 दिसंबर, सन् 1882 को हुआ था। उनके पिता का नाम चिन्नास्वामी अय्यर और माँ का नाम लक्ष्मी अम्माल था। बचपन में भारती को सुब्बैया कहकर पुकारा जाता था।

ग्यारह वर्ष में सुब्बैया को दरबार में कविता पाठ करने के लिए आमंत्रित किया। दरबार में एकत्र हुए विख्यात कवि उनका कविता पाठ सुनकर दंग रह गए। उन्होंने उन्हें ‘भारती‘ की उपाधि से सुशोभित किया। इस तरह वे ‘सुब्रह्मण्य भारती‘ के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

14 वर्ष की आयु में उनका विवाह चेल्लम्माल से हुआ। विवाह के कुछ दिनों के बाद माता-पिता की मृत्यु हो गयी, जिसके कारण वे अपने काकी के घर बनारस चले गए। बनारस में रहते हुए भारती के व्यक्तित्व और विचारधारा में भी महान परिवर्तन आया। उन्होंने हिंदी, अँग्रेजी और संस्कृत भाषाएँ सीखीं।

उनके हृदय में उग्र राष्ट्रीयता के बीज के बीज पनप रहे थे। उन्हें ब्रिटिश राज के बंधन में बँधे भारतीयों का दुःख व उनकी पीड़ा महसूस होने लगी। अपने गीतों के माध्यम से भारतीय लोगों के हृदयों में राष्ट्रीयता की भावना जगाने लगे। जंगल की आग की तरह फैलते-फैलते ये गीत, शीघ्र ही राज्य के अधिकतम व्यक्तियों के हृदय तक पहुँच गए।

उग्र विचारों से प्रभावित होने के कारण, उन्हें यह विश्वास हो गया था कि नरमपंथी दृष्टिकोण से देश कभी भी स्वतंत्र नहीं हो सकता। उनके मन में बाल गंगाधर तिलक और विपिन चन्द्र पाल के प्रति बहुत सम्मान उत्पन्न हो गया। वे लोग क्रांतिकारियों की तरह भारत की स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने को तत्पर हो गए भारती स्वयं किसी से सहायता नहीं माँगते थे। सहायता माँगने से उनके स्वाभिमान को ठेस लगती थी, किंतु गरीबी उनकी उदारता को कम नहीं कर पाई थी। एक बार उन्होंने अपना बहुमूल्य जरी के बॉर्डरवाला अंगवस्त्र तक, जिसे किसी अमीर प्रशंसक ने उन्हें दिया था, एक गरीब को दे दिया था। दूसरों की खुशी उनकी अपनी खुशी थी। वे अपने लेखन में अक्सर यह बात व्यक्त करते थे कि समस्त जीवित प्राणी उस सर्वोच्च शक्ति की अनुपम रचना हैं और उसकी नजर में हम सब बराबर हैं। भारती ने स्वतंत्र भारत के ऐसे लोगों की कल्पना की थी जो उच्च विचारों को आत्मसात कर उन्हें बढ़ावा दें। वे सहज ही पिछड़ी जाति के हिंदुओं और मुसलमानों से हिलमिल जाते थे।

अब तक गांधी-जी का सार्वभौमिक प्रेम व भाईचारे का संदेश देशभर में चारों ओर फैलने लगा था। उससे प्रभावित होकर भारती ने लिखा--

“रे मेरे मन! मधुर
दया दिखा शत्रु पर“
मानव-मानव एक समान
एक जाति की हम संतान
यही दृष्टि है खुशी आज की
बजा नगाड़ा,करो घोषणा प्रेम-राज्य की।“

भारती गांधी-जी से चेन्नई (मद्रास) में सन् 1919 में केवल एक बार मिले थे और वह भी कुछ क्षणों के लिए। गांधी-जी ने राजाजी और अन्य काँग्रेसी नेताओं और देशभक्तों से कहा था, “भारती देश का एक ऐसा रत्न है जिसकी सुरक्षा और संरक्षण करना चाहिए।“

वर्तंमान में भी हमारे देश में जाति-प्रथा की पैरवी करने वालों की कमी नहीं है। आज से सौ वर्षों पूर्व ब्राह्मण परिवार के भारतीजी ने इसका उल्लंघन किया। ये उनके विशाल और उदार मन ही नहीं साहस को भी बताता है। उन दिनों ऊँची जाति के लोग नीची जाति के लोगों की परछाई से भी दूर रहते थे। पर भारतीजी उनके घर भी जाते थे और उनके साथ खाना भी खाते थे और उनके साथ पूजा-पाठ में हिस्सा भी ले लेते थे। पुदुचेरी में रहते हुए घर के काम-काज में हाथ बाँटने वाली अम्मांकण्णु के घर में दत्तात्रेय की मूर्ति और कुछ शस्त्र बहुत अरसे तक पूजा के आले में रखे हुए थे। नीची जाति के या हरिजन साथियों के साथ उठना-बैठना, खाना-पीना उनके लिए साधारण बात थी। जाति या धर्म से परे, ऐसे युवा लोगों में उनकी दोस्ती रही। 

भारतीजी उदार और विशाल हृदय के ऐसे देशभक्त थे, जिनके लिए देश का हित सर्वोपरी था। भारत माँ की आजादी के लिए वो जूनून की हद तक भावुक थे। उनकी देश-भक्ति और आजादी की प्यास वाली रचनाओं बच्चों, जवान, प्रौढ़ और महिलाओं में भी जोश भर दिया था।

प्राचीन तमिल भाषा में बाद में बहुत सुधार और नए वर्ण और अक्षर आ चुके थे। जिससे जन समुदाय भी पढ़ कर रस ले सकता था। भारती ने पत्र में इसी का हवाला देते हुए लिखा कि वे चाहें तो भारती नए सिरे से उस इतिहास की भाषा को प्रवाहमय और मनोरंजक कर देंगे। इसके लिए वो एटैयापुरम जाकर रहने को भी तैयार थे। पर राजवंश ब्रिटिश साम्राज्य के आधिपत्य में होने से भारती केमेल-मिलाप से डरते थे। भारती के विचार से सहमत होते हुए भी उन्होंने पत्र का कोई जवाब नहीं दिया। गाँव (कडैयम) के सुस्त-सोते से वातावरण में उनका दम घुटने लगा। उनकी मानसिक अवस्था पर भी इसका असर पड़ रहा था। आए दिन किसी से किसी भी बात पर बहस और वाद-विवाद करने लगते और रिश्ते बिगड़ जाते। आर्थिक कठिनाई भी यहाँ रहते हुए तो दूर हो ही नहीं सकती थी।

'सब एक जाति
एक वर्ग के ही हैं
सभी भारतीय हैं। सब एक इकाई हैं
सभी के एक ही सिद्धांत है।
सभी और हर कोई इस देश का राजा है'

भारती द्वारा रचित उनका आखिरी गीत, जो उन्होंने चेन्नई (मद्रास) के समुद्रतट पर हुई सभा में अपनी मृत्यु से कुछ सप्ताह पहले गाया था, उनके बहुत लोकप्रिय गीतों में से एक है-

“भारतीय समुदाय अमर हो
जय हो भारत-जन की जय हो।
भारत-जनता की जय-जय हो।‘

-डॉ. एस मुथुकुमार
ई-मेल : drmuthu_s@yahoo.com

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