तुम कौन-सी पाटी पढ़े हो लला : पुस्तक समीक्षा

रचनाकार: डॉ स्वाति चौधरी

●    उपन्यास: “तुम कौन-सी पाटी पढ़े हो लला”
●    लेखक: आचार्य राजेश कुमार 
●    समीक्षक: डॉ स्वाति चौधरी

तुम कौन-सी पाटी पढ़े हो लला

विश्व की मिट्टी पर जड़ें तलाशता मन

आचार्य राजेश कुमार का उपन्यास “तुम कौन-सी पाटी पढ़े हो लला” आधुनिक भारतीय समाज के उस भीतरी द्वंद्व को उजागर करता है जो व्यक्ति के भीतर और बाहर दोनों में एक साथ घटित होता है। पहली दृष्टि में यह एक साधारण प्रेमकथा प्रतीत होती है, जिसमें एक युवक और दो स्त्रियों के बीच भावनात्मक उलझनों का जाल बुना गया है; लेकिन जैसे-जैसे पाठक इसमें प्रवेश करता है, यह कहानी प्रेम की सीमाओं से बहुत आगे निकलकर सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक प्रश्नों की गहराइयों में उतरती जाती है।

मिकी, उपन्यास का नायक, भारतीय ग्रामीण पृष्ठभूमि से आया एक युवक है — ईमानदार, परिश्रमी और महत्वाकांक्षी। उसके भीतर अपनी जड़ों से जुड़ी मासूमियत है, जो उसे ‘धरती का बेटा’ बनाती है, लेकिन उसी के भीतर आधुनिकता की चमक-दमक के प्रति एक आकर्षण भी पल रहा है। राजेश कुमार ने अपने कथानक की बुनावट इस तरह की है कि मिकी का जीवन एक प्रतीक बन जाता है — भारतीय युवा की आकांक्षा का प्रतीक, जो अपने गाँव की मिट्टी से निकलकर विश्व नागरिक बनने का स्वप्न देखता है, पर वहाँ पहुँचकर पाता है कि चमकते सपनों के पीछे भी एक अँधेरा है। 

राजेश कुमार की लेखन-दृष्टि यहाँ अत्यंत तीक्ष्ण और व्यंग्यात्मक हो उठती है। वह किसी पात्र का निर्णय नहीं करते; बल्कि परिस्थितियों के माध्यम से समाज की परतें खोलते जाते हैं। लेखक की संवेदनशीलता इस बात में है, कि वह दृश्यों को केवल रोमांचक नहीं बनाते, उनमें भावनात्मक गहराई भरते हैं।

उपन्यास के उत्तरार्ध में लेखक की दृष्टि और व्यापक हो जाती है। जब मिकी भारत की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति पर विचार करता है, तो उपन्यास एक व्यक्तिगत कथा से निकलकर सामाजिक घोषणा-पत्र का रूप ले लेता है। भ्रष्ट नेता, बिके हुए मीडिया, मंदिर-राजनीति, बेरोजगारी, महँगाई, स्त्री-असुरक्षा — मिकी का चिंतन केवल शिकायत नहीं है, बल्कि एक यथार्थ का बयान है। यहाँ लेखक का स्वर व्यंग्यात्मक से अधिक आक्रोशपूर्ण हो जाता है, पर वह कभी अतिरंजित नहीं होता।

मिकी के भीतर एक नया स्वप्न जन्म लेता है — समाज को बदलने का। ऐश के साथ मिलकर वह ‘रब राखा पार्टी’ बनाता है। यह प्रसंग उपन्यास का सबसे प्रतीकात्मक मोड़ है। जिस स्त्री के साथ उसने प्रेम और विश्वास के सबसे कठिन क्षण जिए, वही अब उसके संघर्ष की साथी बनती है। यहाँ लेखक यह संकेत देता है कि परिवर्तन व्यक्तिगत संबंधों से भी उत्पन्न हो सकता है — प्रेम, यदि आत्मीयता में रूपांतरित हो जाए, तो सामाजिक ऊर्जा का स्रोत बन सकता है।

‘रब राखा पार्टी’ का गठन और ऐश का चुनाव मैदान में उतरना उस नई चेतना का प्रतीक है जो प्रेम की विफलता से नहीं, बल्कि आत्मबोध से जन्म लेती है। लेखक ने इस पूरी प्रक्रिया को अत्यंत यथार्थवादी ढंग से चित्रित किया है। वह चुनावी राजनीति के काले खेल को भी सामने रखते हैं। ‘मैनिपुलेट किए गए एग्जिट पोल’, सरकारी एजेंसियों का पक्षपात, मीडिया की मिलीभगत — ये सब दृश्य इतने जीवंत हैं कि पाठक को लगता है जैसे वह किसी वास्तविक चुनावी परिदृश्य का हिस्सा बन गया हो। ऐश का संघर्ष, उसका धैर्य, और अंततः उसकी जीत — यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि आशा की पुनर्स्थापना है। जब ऐश मुख्यमंत्री बनती है, तो यह विजय केवल उसकी नहीं, बल्कि उस सोच की है जो ईमानदारी में विश्वास रखती है।
राजेश कुमार का व्यंग्य सीधा है, लेकिन उनकी संवेदना गहरी है। वे व्यवस्था की बुराइयों को उजागर करते हैं, पर साथ ही यह भी दिखाते हैं कि व्यवस्था से बाहर भी उम्मीदें हैं। वे पाठक को यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि परिवर्तन केवल आलोचना से नहीं, बल्कि कर्म से संभव है। मिकी का रूपांतरण इसी विचार का मूर्त रूप है — एक युवक जो प्रेम में ठगा गया, अपराध की ओर भटका, लेकिन अंततः समाज परिवर्तन की राह चुनता है।

“तुम कौन-सी पाटी पढ़े हो लला” इस दृष्टि से समकालीन हिंदी उपन्यासों की पंक्ति में एक विशिष्ट स्थान रखता है। इसमें जीवन का सत्य है, समाज की आलोचना है, और मानवीय करुणा का गहन अनुभव भी। राजेश कुमार ने प्रेम, व्यंग्य, राजनीति और यथार्थ — इन चारों तत्वों को एक साथ जोड़ा है, और उनमें कहीं भी कृत्रिमता नहीं आने दी। उनका लेखन एक दर्पण की तरह है — चमकदार भी, और काटने वाला भी।

संक्षिप्त में यह कहा जा सकता है कि “तुम कौन-सी पाटी पढ़े हो लला” प्रेम, प्रवास और समाज — इन तीनों के संगम से बनी एक सशक्त, संवेदनशील और यथार्थवादी कृति है। यह न केवल अपने समय का दस्तावेज़ है, बल्कि आने वाले समय के लिए भी एक चेतावनी है — कि अगर हम अपने भीतर की मानवता को बचाए नहीं रखेंगे, तो हमारे सारे सपने सिर्फ़ विज्ञापन बनकर रह जाएँगे।

-डॉ स्वाति चौधरी