हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। - राजेंद्रप्रसाद।

मौन के क्षण | बातें देश-विदेश की (विविध)

Print this

Author: विनीता तिवारी

1997 में जब अमेरिका आई तो कुछ वर्ष घर की ज़िम्मेदारियों को सम्भालने और कुछ यहाँ के हिसाब से जीवन शैली को व्यवस्थित करने में निकल गये। फिर बच्चों एवं परिवार को प्राथमिकता देते हुए बैंक में पार्ट टाइम काम करना शुरू किया। जब बच्चे स्कूल जाने लगे तो सोचा कि बैंक की नौकरी छोड़कर विद्यालय में ही नौकरी कर ली जाए ताकि बच्चों के साथ सर्दी-गर्मी की छुट्टियों का आनंद उठाया जा सके और उन्हें इधर उधर डे केयर में भी नहीं छोड़ना पड़े। बात जब दिमाग़ में बैठ गई तो कुछ दिनों पश्चात् उसका क्रियान्वयन भी हो गया। चंद परीक्षाओं एवं साक्षात्कारों से सफलतापूर्वक गुजरने के बाद एक उच्च-माध्यमिक विद्यालय में पर्मानैंट सब्स्टिट्यूट टीचर की नौकरी सुनिश्चित हुई।

अमेरिका के इस उच्च माध्यमिक विद्यालय का समय था सुबह 9:15 से शाम 4:03 बजे तक। मेरी दृष्टि से किसी भी विषय की पढ़ाई में तन्मयता से जुटे रहने के लिए ज़रूरत से ज़्यादा लम्बा समय। मेरे समय में भारत के सरकारी विद्यालय सात से साढ़े बारह या साढ़े बारह से छह बजे तक की पारी में चला करते थे। ख़ैर, इस बात की मुझे ख़ुशी भी थी कि मुझे स्कूल में बहुत ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी तो दूसरी तरफ़ दुख भी था कि कितने ही विषयों से मेरी जानकारी पूरी तरह अछूती रही।

विद्यालय में पहले दिन जाकर पता चला कि अमेरिका के सरकारी स्कूलों में दिन की शुरुआत किसी क्रिश्चियन भजन, गीत या प्रार्थना से नहीं होती बल्कि सिर्फ़ “मौन के कुछ क्षणों” या कहिए “Moments of silence” से होती है।

मौन के इन क्षणों में आप जिसका ध्यान, चिंतन-मनन करना चाहें कर सकते हैं। विद्यालय के सभी कर्मचारी और विद्यार्थी इन क्षणों में शान्ति से बिना एक दूसरे पर ध्यान दिए अपने अपने इष्ट का सामूहिक रूप से ध्यान कर वातावरण को सकारात्मक ऊर्जा से भर देते हैं। मौन के इन क्षणों में कोई भगवान को अपने ख़ूबसूरत जीवन के लिए धन्यवाद प्रेषित कर रहा होता है तो कोई अपने दिन की अच्छी शुरुआत के लिए प्रार्थना। सम्भव है कुछ अपनी परेशानियों के लिए ईश्वर से झगड़ भी रहे हों लेकिन जो भी हो अमेरिका के सरकारी स्कूलों का धर्म निरपेक्ष और सभी धर्मों के प्रति समान आदर भाव का यह तरीक़ा मुझे बेहद पसंद आया।

दूसरी बात जो आप सबको शायद अजीब सी लगे वो ये कि यहाँ प्राइमरी से लेकर हाई स्कूल तक, विद्यार्थियों की कोई यूनिफ़ॉर्म राज्य सरकार द्वारा निर्धारित नहीं की गई है। मतलब ये कि आपकी जो इच्छा हो आप वो पहन कर स्कूल आ सकते हैं। हाँ, अगर आपकी वेशभूषा बिलकुल ही सामाजिक दायरों के बाहर है तो आपको अलग से बुलाकर सचेत किया जा सकता है मगर आपको किसी नियत तरह के परिधान में आने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इसका परिणाम यह है कि मैं स्कूल में टरबन पहने सिख बच्चों को भी देखती हूँ तो हिजाब या कभी कभी अबाया पहने मुस्लिम बच्चियों को भी। फटी जींस में आ रही लड़कियों को भी देखती हूँ तो लम्बे, घुंघराले बालों में हेयर बैंड या टोपी लगाए लड़कों को भी। ये कहना ग़लत नहीं होगा कि अमेरिका में फ़ैशन काफ़ी हद तक माध्यमिक, उच्च-माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर ही तय होता है।

हालाँकि विद्यालयों में यूनिफ़ॉर्म नहीं होने की बहुत सी समस्याएँ भी हैं लेकिन हाल ही में भारत में यूनिफ़ॉर्म को लेकर हुई वारदातों को देखकर लगता है कि अमेरिका जैसे विशाल बहुसांस्कृतिक, बहुधर्मी और विविधताओं से भरे देश में स्कूल यूनिफ़ॉर्म का ना होना ही शायद बेहतर विकल्प है।

-विनीता तिवारी, अमेरिका

Back

 
Post Comment
 
 
 
 
 

भारत-दर्शन रोजाना

Bharat-Darshan Rozana

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें