हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी

ब्रिटिश प्रधानमंत्री-ऋषि सुनक (विविध)

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Author: विनीता तिवारी

हाल ही में इंग्लैंड के 56वे प्रधानमंत्री पद के लिए ऋषि सुनक का चुना जाना इंग्लैंड और बाक़ी दुनिया के लिए तो एक सनसनीख़ेज़ खबर है ही, मगर उससे भी कहीं बहुत-बहुत ज़्यादा ये बात भारत में चर्चा का केंद्र बनी हुई है! सुनने में आ रहा है कि इस चर्चा की वजह उनके भारतीय मूल का निवासी होना है और अब भारतीय मूल के किसी इंसान का इंग्लैंड में प्रधानमंत्री बनना कुछ भारतीयों को इंग्लैंड में अपना साम्राज्य स्थापित होने जैसा महसूस हो रहा है। किसी को इस राजनैतिक उथल-पुथल में ब्रिटिशर्स को अपने अनैतिक कर्मों का फल मिलता दिखाई दे रहा है तो किसी को इंग्लैंड की राजनीति में भारत और वहाँ रहने वाले प्रवासी भारतीयों को एक विशिष्ट अतिथि का दर्जा मिलने की संभावना दिखाई दे रही है। रब्बा ख़ैर करे ये इंसान का दिमाग़ भी क्या चीज़ है न, कि हर सूचना में सबसे पहले अपना व्यक्तिगत फ़ायदा नुक़सान ढूँढने लगता है।

वैसे ये बात सच में नाज़ करने जैसी है कि ऋषि सुनक इंग्लैंड के पहले ऐसे प्रधानमन्त्री हैं जिनकी पुश्तैनी जड़ें अंग्रेजों के ज़माने के भारत और वर्तमान समय के पाकिस्तान में मिलती हैं। उनके दादा दादी 1935 में अविभाजित भारत के गुज़रानवाला से निकल कर बेहतर जीवन की तलाश में दक्षिण अफ़्रीका के केन्या देश में पहुँचे। केन्या में क़रीब 30-32 वर्ष रहने के पश्चात वहाँ भी जटिल परिस्थितियों के चलते वे 1960 के दशक में इंग्लैंड जा बसे। यहीं तंज़ानिया में जन्मी ऋषि सुनक की माता और नैरोबी, केन्या में जन्मे उनके पिता एक दूसरे के सम्पर्क में आये और विवाह बंधन में बंधे। आप दोनों से उत्पन्न तीन संतानों में ऋषि सुनक सबसे बड़े है। ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़े सुनक जब MBA करने अमेरिका के स्टैनफ़र्ड विश्वविद्यालय पहुँचे तो उनकी मुलाक़ात अपनी भावी पत्नी अक्षता मूर्ति से हुई। इस मुलाक़ात के क़रीब चार साल बाद एक दूसरे से विवाह बंधन में बंधे ऋषि एवं अक्षता अब ब्रिटेन के 222वें सबसे अमीर दम्पति हैं। ये तो थी ऋषि सुनक के परिवार और उनकी पुश्तैनी जड़ों की बातें, लेकिन इस परिवार की जड़ों को खोद निकालने से भारत या पाकिस्तान या तंज़ानिया या फिर केन्या के लोगों का अपने फ़ायदे नुक़सान की अटकलें लगाना थोड़ा हास्यास्पद सा लगता है।

याद होगा जब कुछ ही सालों पहले कमला हैरिस अमेरिका की उपराष्ट्रपति के पद पर चुनी गयी थीं तब भी भारत में कुछ ऐसा ही माहौल बना था जैसे भारत-अमेरिका के रिश्ते में बहुत ही निकटता बल्कि घनिष्ठता बढ़ने वाली हो। कैलिफ़ोर्निया में जन्मी 58 वर्षीय कमला देवी हैरिस भी ऋषि सुनक की तरह अफ़्रीका और एशिया दोनों महाद्वीपों से सम्बन्ध रखती हैं मगर पिछले डेढ़-दो सालों में उनको लेकर जो ख़याली पुलाव पकाए जा रहे थे वैसा कुछ देखने को मिला नहीं।

ऋषि सुनक को लेकर तो भारत में उत्साह उनसे भी कहीं बहुत ज़्यादा है, और इस उत्साहपूर्ण उम्मीद के लिये यक़ीनन ऐतिहासिक घटनाएँ ज़िम्मेदार हैं। लेकिन क्या बात-बात में इतिहास के पन्ने पलटना और उसे भूलकर आगे न बढ़ना निरी मूर्खता सी नहीं लगती? तक़रीबन एक सदी पहले छोड़ी हुई जगह से इंसान जुड़ा तो होता है मगर बस उतना ही जितना कि दिल्ली बंबई की NRI कालोनी में रहने वाले रईस अपने पुरखों के गाँव से जुड़े होते हैं। ऋषि सुनक के बारे में अब तक की जानकारी से ये तो तय हो ही गया कि ऋषि सुनक और उनके परिवार पर एक दो नहीं बल्कि चार-पाँच देशों के साहित्य एवं संस्कृति का प्रभाव है। उनकी अपनी शिक्षा-दीक्षा इंग्लैंड के आक्सफोर्ड और अमेरिका के स्टैनफ़र्ड जैसे दुनिया के बेहतरीन विश्वविद्यालयों में होना उन्हे एक बहुसांस्कृतिक एवं सुशिक्षित राजनैतिज्ञ के रूप में प्रतिष्ठित करता है। और एक वैल राउंडेड पॉलिटिकल लीडर से ये उम्मीद की जानी चाहिए कि उनके द्वारा लिए जाने वाले राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर के निर्णयों में न सिर्फ़ उनके अपने जीवन से जुड़े दुनिया के देशों की बल्कि सम्पूर्ण विश्व की समृद्धि और शांति की भावना समाहित हो।

विनीता तिवारी
वर्जीनिया, अमेरिका

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