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पुतिन- ‘अग्नि दीक्षा’ से ‘अग्नि परीक्षा’ तक (विविध)

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Author: डॉ कुमार कौस्तुभ

सोवियत युग के प्रमुख उपन्यास ‘अग्नि दीक्षा’ (How The Steel Was Tempered, अनुवाद- अमृत राय) की भूमिका में एन वेन्ग्रोव लिखते हैं-“ ‘अग्नि दीक्षा’ नये मानव के जन्म की कहानी है, समाजवादी युग के उस नये मनुष्य की, जो मानवता के सुख के लिए होनेवाले संघर्ष में सब कुछ करने की योग्यता अपने अंदर दिखलाता है, जो बड़े-बड़े काम अपने सामने रखता है और उन्हें पूरा करके दिखलाता है” (पृ. 20, 1981) । ये पंक्तियां कहीं-न-कहीं रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर माकूल बैठती हैं, जो सोवियत युग में ही पैदा हुये (1952), जिन्होंने सोवियत शासन को अपने उरूज पर देखा, सोवियत खुफिया सेवा केजीबी में नौकरी भी की (1975-1990), सोवियत संघ का विघटन (1991) भी देखा और 1996 से रूसी राजनीति और प्रशासन में सक्रिय रहते हुए न सिर्फ सत्ता के शिखर तक पहुंचे बल्कि रूस में सबसे ज्यादा लंबे समय तक शीर्ष पदों पर रहने का रिकॉर्ड भी कायम कर सकते हैं। पुतिन को जहां सोवियत रूस के विघटन के बाद बने रशियन फेडरेशन को कंगाली और खस्ताहाली से उबारकर नये सिरे से खड़ा करने का श्रेय जाता है, वहीं अपनी सख्त और आक्रामक नीतियों के कारण उन पर तानाशाही के भी आरोप लगते रहे। खासतौर से 2022 में 24 फरवरी के बाद से यूक्रेन पर रूसी हमलों को लेकर पुतिन की चौतरफा आलोचना शुरु हो गई।

प्रश्न यह है कि क्या सोवियत शासन के उत्तरार्द्ध में और उसके बाद ‘अग्नि दीक्षा’ के जरिए मुश्किल हालात के बीच तप कर खरे सोने की तरह ताकतवर नेता के रूप में उभरे और शासन पर काबिज हुये पुतिन के लिए अपनी सत्ता पर पकड़ मजबूत बनाये रखने के लिए अब अग्नि परीक्षा की घड़ी आ गई है? भले ही पुतिन ने 6 अप्रैल 2021 को एक नए कानून पर हस्ताक्षर किये जिसके बाद उनके 2036 तक रूस की सत्ता में बने रहने का रास्ता साफ हो गया। 2 बार प्रधानमंत्री और 3 बार राष्ट्रपति रह चुके पुतिन 2018 में एक बार फिर 6 साल के लिए राष्ट्रपति चुने गये। उनका यह कार्यकाल 2024 में खत्म हो रहा है, लेकिन नये कानून के तहत उनके पास 6-6 साल के दो कार्यकाल और होंगे (आजतक डॉटकॉम, अप्रैल 6, 2021) लेकिन, उससे पहले यूक्रेन में छिड़ी लड़ाई ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पुतिन रूस में सर्वाधिक समय तक सत्ता पर कब्जे का रिकॉर्ड कायम कर सकेंगे या उन्हें बेआबरू होकर कूचे से निकलना पड़ेगा। अपने अगले चुनाव से पहले यूक्रेन संकट के कारण पुतिन बहुत-ही कठिन परिस्थिति से गुजर रहे हैं। यूक्रेन पर हमले के लिए जहां एक ओर उन्हें अमेरिका और यूरोप समेत लगभग सारे देशों का विरोध झेलना पड़ रहा , तो वहीं दूसरी ओर साम्यवादी शासन से लोकतंत्र बने उनके अपने देश रूस में भी उनके खिलाफ माहौल बनने लगा है और उनकी कार्रवाई के विरुद्ध आवाजें उठने लगी हैं।

अमेरिका और नाटो ने भले ही लहूलुहान यूक्रेन का साथ देने के लिए हथियार उठाने से परहेज किया, परंतु, तरह-तरह की पाबंदियां लगाकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय फलक पर रूस को अलग-थलग करने की कार्रवाई जरूर शुरु कर दी। पहले अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूसी बैंकों और अरबपतियों के कारोबार पर रोक लगाई। इसके बाद, राष्ट्रपति पुतिन, विदेश मंत्री लावरोव और उनके रक्षा मंत्री से जुड़ी संपत्तियों को फ्रीज करने का एलान हुआ। जर्मनी ने रूस गैस पाइपलाइन से हाथ खींच लिया। फिर, रूसी विमानों के लिए एयरस्पेस बंद करने का कदम उठाया गया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भुगतान और लेनदेन की व्यवस्था SWIFT से भी रूस को हटाने की मांग उठी। इस बीच, खेलों के अंतरराष्ट्रीय संगठनों से रूस को निकाल बाहर किया गया। अंतराराष्ट्रीय ओलंपिक संघ, फुटबॉल और जूडो से जुड़े संगठनों ने रूस से किनारा कर लिया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और संयुक्त राष्ट्र महासभा में भले ही रूस के वीटो के कारण उसके खिलाफ प्रस्तावों को कामयाबी न मिले, लेकिन, अमेरिका और यूरोप की रूस-विरोधी लॉबी ने कूटनीतिक स्तर पर पुतिन के लिए मुश्किलें जरूर बढ़ा दीं।

इस दरम्यान, यूक्रेन पर रूस के हमलों में कमी नहीं आई और यूक्रेन यूरोपीय संघ, नाटो से सदस्यता की गुहार लगाता ही रह गया। यही वो पेंच है जिसको लेकर यूक्रेन पर रूस आगबबूला है और हमले पर हमले करता जा रहा है। रूस नहीं चाहता कि यूक्रेन नाटो का सदस्य बने। रूस के राष्ट्रपति पुतिन कह चुके हैं कि यह रूस की संप्रभुता और सुरक्षा पर खतरा होगा। पुतिन कह चुके हैं कि यूक्रेन को तटस्थ देश रहना चाहिए। लेकिन, यूक्रेन नाटो और अमेरिका के खेमे में जाने के लिए आतुर है। यूक्रेन नहीं चाहता कि उसे रूस के दबदबे को सहना पड़े। वहीं, विडंबना यह भी है कि वह नाटो और अमेरिका की कठपुतली बनने के लिए तैयार है। विदित हो कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ को रोकने के लिए अमेरिका और यूरोपीय देशों ने नाटो सैन्य संगठन बनाया था (भास्कर डॉटकॉम, 28 फरवरी 2022)। अब सोवियत रूस नहीं रहा, लेकिन रूस तो है, तो कहीं न कहीं अमेरिका और सदस्य देश चाहते हैं कि क्षेत्रीय स्तर पर उसका दबदबा न बन सके जिसकी आहट 2014 में यूक्रेन से क्रीमिया के अलग होकर रशियन फेडरेशन से जुड़ने पर ही मिलने लगी थी। 2022 में यूक्रेन के साथ तनाव बढ़ने पर पूर्वी यूक्रेन के दो क्षेत्रों दनिएत्स्क और लुगांस्क को रूस की ओर से स्वतंत्र देश की मान्यता देने के काम ने आग में घी का काम किया। फिर भी, युद्ध सरीखे आक्रामक हमलों की पहल यूक्रेन या अमेरिका समर्थित नाटो की ओर से नहीं हुई, बल्कि रूस की ओर से ही हुई। रूसी सुरक्षा परिषद ने 22-23 फरवरी 2022 को दोनों क्षेत्रों में रूसी सैन्य कार्रवाई को मंजूरी दे दी जिसके बाद रूस ने हमले शुरु कर दिये।

सवाल यह है कि क्या रूस ने यूक्रेन पर हमला करने में जल्दबाजी की? क्या रूस को प्रतीक्षा करनी चाहिए थी? क्या रूस को इस बात का डर था कि अगर समय दिया गया को यूक्रेन की ओर से कड़ी कार्रवाई हो सकती थी? क्या रूस ने अपनी ताकत की नुमाइश करने के लिए पहले हमला करने का खतरनाक कदम उठा लिया? इन प्रश्नों के सही-सही उत्तर तो रूस की सरकार और वहां के नुमाइंदे ही दे सकते हैं। लेकिन, आमतौर पर यह माना जा सकता है कि रूस को यूक्रेन से तत्काल कोई खतरा नहीं था। यूक्रेन के राष्ट्रपति की अपीलों के बावजूद अमेरिका और नाटो बेहद सुस्त रुख अपनाये हुये थे। रूस चाहता तो इंतजार कर सकता था और जरूरत पड़ने पर आत्मरक्षा की कार्रवाई कर सकता था। दनिएत्स्क और लुगांस्क को मान्यता देने के बाद भी रूस के पास यूक्रेन की ओर से होनेवाली संभावित कार्रवाई का जवाब देने के लिए पर्याप्त समय था। लेकिन, रूस ने गेंद उनके पाले में फेंककर देखने के बजाय आश्चर्यजनक रूप से पहले हमले का कदम उठा लिया जिसका नतीजा बेहद खौफनाक रहा। अमेरिका और नाटो के सुस्त या संयमित रवैये का खामियाजा यूक्रेन को बुरी तरह से भुगतना पड़ा। वहीं, रूस के सामने यह स्थिति पैदा हो गई कि अपनी तरफ से युद्ध छेड़कर आग के दरिया में पांव डाल चुका तो निकाले कैसे? और सवाल यह भी है कि बेकाबू हो रही स्थिति से अमेरिका और मित्र देशों को क्या फायदा होगा?

विदेशी मामलों के जानकार प्रकाश के. रे का मानना है कि मौजूदा संकट से अमेरिका को यह लाभ होगा कि उसके साये और प्रभाव से निकलता जा रहा यूरोप फिर उसके पीछे आएगा। वहीं, रूस के लिए फायदे की बात यह है कि ग्लोबल साउथ और यूरेशिया में उसके संबंध गहरे होंगे। जबकि ग्लोबल साउथ के देश शीत युद्ध 2.0 और मल्टीपोलर वर्ल्ड में अधिक मोल-तोल करने की स्थिति में होंगे (फेसबुक, 2 मार्च 2022)।

रूस-यूक्रेन युद्ध के दूरगामी फायदे-नुकसान जो भी हों, लेकिन, तत्काल तो दुनिया परेशान हो ही गई। माना जाता है कि रूस के पास 600 अरब डॉलर से ज्यादा का विदेशी मुद्रा भंडार है। लेकिन, जब चंद देशों को छोड़कर बाकी देश उससे संबंध तोड़ने पर आमादा हैं, तो पुतिन भला अपना देश कब तक और कैसे चला सकेंगे? दुनियाभर में अलग-थलग पड़े उत्तर कोरिया की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। पुतिन के लिए निश्चित रूप से यह अग्निपरीक्षा की घड़ी है। रूस के पास अकूत प्राकृतिक संसाधन हैं, लेकिन जब उनका खरीदार ही नहीं रहेगा, तो मुश्किलें बढ़ेंगी ही। वहीं, ऐसा नहीं है कि सिर्फ रूस को नुकसान होगा, दिक्कत तो यूरोप को भी होगी, दबाव उस पर भी बढ़ रहा है। गैस की कीमतों में इजाफे से इंकार नहीं किया जा सकता। रूस और यूक्रेन से गेहूं का भी बड़ा निर्यात होता है, तो जो देश उन पर निर्भर हैं, उनके लिए भी समस्या होगी। भू-राजनैतिक स्थितियां जो भी हों, आर्थिक और व्यापारिक मसलों पर एक-दूसरे पर बन चुकी निर्भरता को झटके में नहीं खत्म किया जा सकता। यह बात चीन के मामले में भी देखी जा चुकी है। बहरहाल, विश्व राजनीति के इन बड़े खिलाड़ियों की तनातनी का शिकार तो दुनिया की सबसे छोटी इकाई यानी आम लोग ही होते हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आपसी द्वंद्व में उलझी दुनिया यह क्यों नहीं सोचती कि जिस मानवता की दुहाई सारे बड़े नेता देते हैं, उसको आखिर इस लड़ाई में कैसे बचाया जाये?

-डॉ कुमार कौस्तुभ
 ईमेल संपर्क- kumar.kaustubh@gmail.com

 

संदर्भ:
https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.342054/page/n1/mode/2up?view=theater
https://www.aajtak.in/world/story/russian-president-vladimir-putin-signs-law-that-allows-him-to-serve-two-more-terms-till-2036-1234025-2021-04-06
https://www.bhaskar.com/db-original/explainer/news/nato-countries-article-russia-ukraine-vivad-role-function-of-nato-129447692.html
https://www.facebook.com/search/top?q=prakash%20k%20ray
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