रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore साहित्य Hindi Literature Collections
कुल रचनाएँ: 31
मेरा शीश नवा दो - गीतांजलि
मेरा शीश नवा दो अपनी
चरण-धूल के तल में।
देव! डुबा दो अहंकार सब
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चरण-धूल के तल में।
देव! डुबा दो अहंकार सब
नहीं मांगता
नहीं मांगता, प्रभु, विपत्ति से,
मुझे बचाओ, त्राण करो
विपदा में निर्भीक रहूँ मैं,
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मुझे बचाओ, त्राण करो
विपदा में निर्भीक रहूँ मैं,
बहुत वासनाओं पर मन से | गीतांजलि
बहुत वासनाओं पर मन से हाय, रहा मर,
तुमने बचा लिया मुझको उनसे वंचित कर ।
संचित यह करुणा कठोर मेरा जीवन भर।
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तुमने बचा लिया मुझको उनसे वंचित कर ।
संचित यह करुणा कठोर मेरा जीवन भर।
अरे भीरु
अरे भीरु, कुछ तेरे ऊपर, नहीं भुवन का भार
इस नैया का और खिवैया, वही करेगा पार ।
आया है तूफ़ान अगर तो भला तुझे क्या आर
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इस नैया का और खिवैया, वही करेगा पार ।
आया है तूफ़ान अगर तो भला तुझे क्या आर
चीन्हे किए अचीन्हे कितने | गीतांजलि
हुत वासनाओं पर मन से हाय, रहा मर,
तुमने बचा लिया मुझको उनसे वंचित कर ।
संचित यह करुणा कठोर मेरा जीवन भर।
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तुमने बचा लिया मुझको उनसे वंचित कर ।
संचित यह करुणा कठोर मेरा जीवन भर।
पोस्टमास्टर | कहानी
नौकरी लगते ही पोस्टमास्टर को ओलापुर गांव में आना पड़ा। साधारण-सा गांव। पास ही एक नीलहे साहब की कोठी है। साहब ने ही बड़ी कोशिश से यहां नया डाकघर खुलवाया है...
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विपदाओं से मुझे बचाओ, यह न प्रार्थना | गीतांजलि
विपदाओं से मुझे बचाओ, यह न प्रार्थना,
विपदाओं का मुझे न होवे भय ।
दुःख से दुखे हृदय को चाहे न दो सांत्वना,
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विपदाओं का मुझे न होवे भय ।
दुःख से दुखे हृदय को चाहे न दो सांत्वना,
विकसित करो हमारा अंतर | गीतांजलि
विकसित करो हमारा अंतर
अंतरतर हे !
उज्ज्वल करो, करो निर्मल, कर दो सुन्दर हे !
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अंतरतर हे !
उज्ज्वल करो, करो निर्मल, कर दो सुन्दर हे !
तू, मत फिर मारा मारा
निविड़ निशा के अन्धकार में
जलता है ध्रुव तारा
अरे मूर्ख मन दिशा भूल कर
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जलता है ध्रुव तारा
अरे मूर्ख मन दिशा भूल कर
अशेष दान
किया है तुमने मुझे अशेष, तुम्हारी लीला यह भगवान!
रिक्त कर-कर यह भंगुर पात्र, सदा करते नवजीवन दान॥
लिए करमें यह नन्हीं वेणु, बजाते तुम गिरि-सरि-तट धूम।
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रिक्त कर-कर यह भंगुर पात्र, सदा करते नवजीवन दान॥
लिए करमें यह नन्हीं वेणु, बजाते तुम गिरि-सरि-तट धूम।
तोता-कहानी | रबीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी
एक था तोता । वह बड़ा मूर्ख था। गाता तो था, पर शास्त्र नही पढ़ता था । उछलता था, फुदकता था, उडता था, पर यह नहीं जानता था कि क़ायदा-क़ानून किसे कहते हैं ।
राजा बोल...
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राजा बोल...
स्वामी का पता
गंगा जी के किनारे, उस निर्जन स्थान में जहाँ लोग मुर्दे जलाते हैं, अपने विचारों में तल्लीन कवि तुलसीदास घूम रहे थे।
उन्होंने देखा कि एक स्त्री अपने मृतक पत...
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उन्होंने देखा कि एक स्त्री अपने मृतक पत...
भिखारिन | रबीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी
अन्धी प्रतिदिन मन्दिर के दरवाजे पर जाकर खड़ी होती, दर्शन करने वाले बाहर निकलते तो वह अपना हाथ फैला देती और नम्रता से कहती- "बाबूजी, अन्धी पर दया हो जाए।"
वह ?...
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वह ?...
काबुलीवाला | रबीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी
मेरी पाँच बरस की लड़की मिनी से घड़ीभर भी बोले बिना नहीं रहा जाता। एक दिन वह सवेरे-सवेरे ही बोली, "बाबूजी, रामदयाल दरबान है न, वह 'काक' को 'कौआ' कहता है। वह कुछ ज?...
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अनधिकार प्रवेश | रबीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी
एक दिन प्रात:काल की बात है कि दो बालक राह किनारे खड़े तर्क कर रहे थे। एक बालक ने दूसरे बालक से विषम-साहस के एक काम के बारे में बाज़ी बदी थी। विवाद का विषय यह ?...
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अनमोल वचन | रवीन्द्रनाथ ठाकुर
प्रसन्न रहना बहुत सरल है, लेकिन सरल होना बहुत कठिन है।
तथ्य कई हैं, लेकिन सच एक ही है।
प्रत्येक शिशु यह संदेश लेकर आता है कि ईश्वर अभी मनुष्यों से निराश न?...
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तथ्य कई हैं, लेकिन सच एक ही है।
प्रत्येक शिशु यह संदेश लेकर आता है कि ईश्वर अभी मनुष्यों से निराश न?...
गीतांजलि
यहाँ हम रवीन्द्रनाथ टैगोर (रवीन्द्रनाथ ठाकुर) की सुप्रसिद्ध रचना 'गीतांजलि'' को श्रृँखला के रूप में प्रकाशित करने जा रहे हैं। 'गीतांजलि' गुरूदेव रवीन्द्?...
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दिन अँधेरा-मेघ झरते | रवीन्द्रनाथ ठाकुर
यहाँ रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचना "मेघदूत' के आठवें पद का हिंदी भावानुवाद (अनुवादक केदारनाथ अग्रवाल) दे रहे हैं। देखने में आया है कि कुछ लोगो ने इसे केदारनाथ...
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चल तू अकेला! | रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता
तेरा आह्वान सुन कोई ना आए, तो तू चल अकेला,
चल अकेला, चल अकेला, चल तू अकेला!
तेरा आह्वान सुन कोई ना आए, तो चल तू अकेला,
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चल अकेला, चल अकेला, चल तू अकेला!
तेरा आह्वान सुन कोई ना आए, तो चल तू अकेला,
रबीन्द्रनाथ टैगोर की कविताएं
रबीन्द्रनाथ टैगोर की कविताएं - गुरूदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर की कविताओं का संकलन।
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विपदाओं से रक्षा करो, यह न मेरी प्रार्थना | बाल-कविता
विपदाओं से रक्षा करो-
यह न मेरी प्रार्थना,
यह करो : विपद् में न हो भय।
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यह न मेरी प्रार्थना,
यह करो : विपद् में न हो भय।
अकेला चल | रबीन्द्रनाथ टैगोर की कविता
अनसुनी करके तेरी बात, न दे जो कोई तेरा साथ
तो तुही कसकर अपनी कमर अकेला बढ़ चल आगे रे।
अरे ओ पथिक अभागे रे।
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तो तुही कसकर अपनी कमर अकेला बढ़ चल आगे रे।
अरे ओ पथिक अभागे रे।
ओ मेरे देश की मिट्टी | बाल-कविता
ओ मेरे देश की मिट्टी, तुझपर सिर टेकता मैं।
तुझी पर विश्वमयी का,
तुझी पर विश्व-माँ का आँचल बिछा देखता मैं।।
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तुझी पर विश्वमयी का,
तुझी पर विश्व-माँ का आँचल बिछा देखता मैं।।