देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।
मेरा शीश नवा दो - गीतांजलि
मेरा शीश नवा दो अपनी
चरण-धूल के तल में।
देव! डुबा दो अहंकार सब
मेरे आँसू-जल में।
अपने को गौरव देने को
अपमानित करता अपने को,
घेर स्वयं को घूम-घूम कर
मरता हूं पल-पल में।
देव! डुबा दो अहंकार सब
मेरे आँसू-जल में।
अपने कामों में न करूं मैं
आत्म-प्रचार प्रभो;
अपनी ही इच्छा मेरे
जीवन में पूर्ण करो।
मुझको अपनी चरम शांति दो
प्राणों में वह परम कांति हो
आप खड़े हो मुझे ओट दें
हृदय-कमल के दल में।
देव! डुबा दो अहंकार सब
मेरे आँसू-जल में।
-रवीन्द्रनाथ टैगोर
साभार - गीतांजलि, भारती भाषा प्रकाशन (1979 संस्करण), दिल्ली
अनुवादक - हंसकुमार तिवारी
प्रतिक्रियाएं (Comments) - 3
मै इसे बेहद पसंद करता हूà¤.....मै रविनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¨à¤¾à¤¥ ठाकà¥à¤° जी को बहà¥à¤¤ पà¥à¤¯à¤¾à¤° करता हूà¤...
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