देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।

मेरा शीश नवा दो - गीतांजलि

रचनाकार: रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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मेरा शीश नवा दो अपनी
चरण-धूल के तल में।
देव! डुबा दो अहंकार सब
मेरे आँसू-जल में।

अपने को गौरव देने को
अपमानित करता अपने को,
घेर स्वयं को घूम-घूम कर
मरता हूं पल-पल में।

देव! डुबा दो अहंकार सब
मेरे आँसू-जल में।
अपने कामों में न करूं मैं
आत्म-प्रचार प्रभो;
अपनी ही इच्छा मेरे
जीवन में पूर्ण करो।

मुझको अपनी चरम शांति दो
प्राणों में वह परम कांति हो
आप खड़े हो मुझे ओट दें
हृदय-कमल के दल में।
देव! डुबा दो अहंकार सब
मेरे आँसू-जल में।

-रवीन्द्रनाथ टैगोर
साभार - गीतांजलि, भारती भाषा प्रकाशन (1979 संस्करण), दिल्ली
अनुवादक - हंसकुमार तिवारी

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 3

A
Akshat akshatgharpure.10@gmail.com
18-Nov-2015 14:13
नाइस पोएम
s
shubham rai shubhamrai161@gmail.com
04-Nov-2014 05:15
ये कविता मेरी प्रेरणाश्रोत है.....
मै इसे बेहद पसंद करता हूँ.....मै रविन्द्रनाथ ठाकुर जी को बहुत प्यार करता हूँ...
s
srishti manochasrishti9@gmail.com
30-May-2014 10:25
ये बड़ी अच्छी कविता है |

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