हिंदी भाषा को भारतीय जनता तथा संपूर्ण मानवता के लिये बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है। - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।
सहजता की ओर (कथा-कहानी)  Click to print this content  
Author:डॉ सतीशराज पुष्करणा

जीवन के साठ वर्ष साहित्य को समर्पित कर देने के पश्चात् जब उन्होंने स्वयं इन साठ वर्षों का मूल्यांकन तटस्थ भाव से किया तो वह दुखी हो उठे।

वह सोचने लगे कि उन्होंने जीवन में अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के समक्ष किसी को महत्त्व नहीं दिया। जब जो सोचा, किया, केवल और केवल अपने लिए, अपने अहम् की तुष्टि के लिए। एक ही संतान हुई-बेटी, उसे भी अच्छी शिक्षा दिलाने हेतु बाहर भेज दिया। जब एम. ए. करके वह घर आई तो विवाह करके विदा कर दिया। इतना बड़ा घर, उसमें केवल दो प्राणी, वह स्वयं और उनकी पत्नी। अब जो मन में आया, करते गए, लिखते गए। किसी ने आलोचना की तो वह उनकी दृष्टि में शत्रु हो गया। पत्नी ने अपने धर्म के साथ-साथ माँ का धर्म भी निभाया। सदैव उनके अहम् की तुष्टि हेतु अपनी इच्छाओं एवं आकांक्षाओं का बलिदान कर

दिया। उनकी जिद एवं आत्मश्लाघा इतनी बढ़ गई कि वह ईर्ष्यालु हो गए। किसी की उपलब्धि बर्दाश्त के बाहर और अपनी प्रत्येक उपलब्धि उन्हें गौण लगती। कॉम्पलैक्स उनका पर्याय बन गया। इन सारी स्थितियों ने उन्हें समाज से अलग कर दिया। वह अपने घर में ही नहीं, संसार में भी अपने को अकेला समझने लगे।

गाय, कुत्ते एवं बिल्लियों के साथ रहने में उन्हें अपने बच्चों का स्नेह मिला, किंतु ये मूक प्राणी कुछ नहीं कहते। उनकी रोटी खाते तो नमक का हक अदा करते, किंतु अपने बच्चे साथ होते तो शायद महत्त्वाकांक्षाएं एवं अहम् कम हो जाते। संतान होती ही ऐसी है, जिस पर एक उम्र के पश्चात् वश नहीं चलता और अहम् को तोड़ देती है। संतान की ममता एवं मोह बड़ा अजीब होता है।

एक बेटी के होते हुए भी उन्हें अब लगने लगा कि वह संतानहीन हैं। विद्वान् होने के बावजूद वह पूरी तरह एक आदमी नहीं बन पाए हैं, केवल साहित्यकार ही बने हैं। मानवता के अभाव में शायद उन्हें अब एहसास होने लगा है कि वह पूर्ण रूप से साहित्यकार भी नहीं बन पाए हैं। वह कालजयी साहित्यकार नहीं बन पाए हैं। स्वाभिमान की आड़ में उन्होंने अभिमान पाल रखा है, जो उन्हें जनप्रिय बनने नहीं देता। आज उन्हें अपने आप पर झुंझलाहट होने लगी। गाय, कुत्ते एवं बिल्लियों का परिवार उन्हें एक फरेब लगने लगा। उन्हें स्मरण हो आया, अपनी नतनियों का उनका अहम्, उन्हें कुछ दबता-सा लगा। लगा कि वह सहज होने लगे हैं, वह भी अन्य आदमियों की तरह आदमी हो रहे हैं।

उन्होंने अपनी पत्नी को आवाज दी, "सुनो, वसुंधरा की तीन बेटियों में से एक को अपने पास रख लो। आज ही दामाद को पत्र लिखकर अनुरोध करो।"

'अनुरोध करो', इन दो शब्दों को उन्होंने अपने आप में पुनः दोहराया। मन ही मन मुस्काए। उन्हें लगा कि अब वह आदमी हो गए हैं, पूरे साहित्यकार हो गए हैं और उनके पालतू जानवर भी उन्हें बच्चों की तरह जिद करते-से लगने लगे। पत्नी से पुनः कहा, "पत्र लिखकर मुझे जल्दी दे दो, मैं स्वयं अपने हाथों से पोस्ट करके आऊंगा ।"

- डॉ सतीशराज पुष्करणा

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