उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans साहित्य Hindi Literature Collections
कुल रचनाएँ: 14
हिन्दी रुबाइयां
मंझधार से बचने के सहारे नहीं होते,
दुर्दिन में कभी चाँद सितारे नहीं होते।
हम पार भी जायें तो भला जायें किधर से,
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दुर्दिन में कभी चाँद सितारे नहीं होते।
हम पार भी जायें तो भला जायें किधर से,
हमने अपने हाथों में
हमने अपने हाथों में जब धनुष सँभाला है,
बाँध कर के सागर को रास्ता निकाला है।
हर दुखी की सेवा ही है मेरे लिए पूजा,
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बाँध कर के सागर को रास्ता निकाला है।
हर दुखी की सेवा ही है मेरे लिए पूजा,
सीता का हरण होगा
कब तक यूं बहारों में पतझड़ का चलन होगा?
कलियों की चिता होगी, फूलों का हवन होगा ।
हर धर्म की रामायण युग-युग से ये कहती है,
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कलियों की चिता होगी, फूलों का हवन होगा ।
हर धर्म की रामायण युग-युग से ये कहती है,
सृजन पर दो हिन्दी रुबाइयां
अनुभूति से जो प्राणवान होती है,
उतनी ही वो रचना महान होती है।
कवि के ह्रदय का दर्द, नयन के आँसू,
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उतनी ही वो रचना महान होती है।
कवि के ह्रदय का दर्द, नयन के आँसू,
सपने अगर नहीं होते | ग़ज़ल
मन में सपने अगर नहीं होते,
हम कभी चाँद पर नहीं होते।
सिर्फ जंगल में ढूँढ़ते क्यों हो?
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हम कभी चाँद पर नहीं होते।
सिर्फ जंगल में ढूँढ़ते क्यों हो?
जी रहे हैं लोग कैसे | ग़ज़ल
जी रहे हैं लोग कैसे आज के वातावरण में,
नींद में दु:स्वप्न आते, भय सताता जागरण में।
बेशरम जब आँख हो तो सिर्फ घूंघट क्या करेगा ?
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नींद में दु:स्वप्न आते, भय सताता जागरण में।
बेशरम जब आँख हो तो सिर्फ घूंघट क्या करेगा ?
दीवाली : हिंदी रुबाइयां
सब ओर ही दीपों का बसेरा देखा,
घनघोर अमावस में सवेरा देखा।
जब डाली अकस्मात नज़र नीचे को,
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घनघोर अमावस में सवेरा देखा।
जब डाली अकस्मात नज़र नीचे को,
स्वप्न सब राख की...
स्वप्न सब राख की ढेरियाँ हो गए,
कुछ जले, कुछ बुझे, फिर धुआँ हो गए।
पेट की भूख से आग ऐसी लगी,
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कुछ जले, कुछ बुझे, फिर धुआँ हो गए।
पेट की भूख से आग ऐसी लगी,
बैठे हों जब वो पास
बैठे हों जब वो पास, ख़ुदा ख़ैर करे
फिर भी हो दिल उदास, ख़ुदा ख़ैर करे
मैं दुश्मनों से बच तो गया हूँ, लेकिन
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फिर भी हो दिल उदास, ख़ुदा ख़ैर करे
मैं दुश्मनों से बच तो गया हूँ, लेकिन
संकल्प-गीत
हम तरंगों से उलझकर पार जाना चाहते हैं।
कष्ट के बादल घिरें हम किंतु घबराते नहीं हैं
क्या पतंगे दीपज्वाला से लिपट जाते नहीं हैं?
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कष्ट के बादल घिरें हम किंतु घबराते नहीं हैं
क्या पतंगे दीपज्वाला से लिपट जाते नहीं हैं?
संकल्प-गीत
हम तरंगों से उलझकर पार जाना चाहते हैं।
कष्ट के बादल घिरें हम किंतु घबराते नहीं हैं
क्या पतंगे दीपज्वाला से लिपट जाते नहीं हैं?
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कष्ट के बादल घिरें हम किंतु घबराते नहीं हैं
क्या पतंगे दीपज्वाला से लिपट जाते नहीं हैं?
भुला न सका | ग़ज़ल
मैं उनकी याद को दिल से कभी भुला न सका,
लगी वो आग जिसे आज तक बुझा न सका।
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लगी वो आग जिसे आज तक बुझा न सका।