चुनाव जीतकर, बना नया सरपंच शिकायत लेकर बी.डी.ओ. साहब के पास पहुँच गया, “साब! मैंने जब पिछली पंचायतों के कागजात देखे तो मैं हैरान रह गया। उन कागजो में मेरे गाँव के छोटूराम के घर से रामदीन के बाड़े तक की गली के साथ-साथ, पंचायत ने तीस साल पहले एक नाला खुदवाया था। बकायदा, उस नाले की खुदाई पर होने वाला मंजूर हुआ खर्चा भी उन कागजो में दर्ज है। जबकि, वास्तव में उस गली में कोई नाला है ही नहीं। फिर भी हर साल बरसात के मौसम में होने वाली उस नाले की सफ़ाई का मंजूर हुआ खर्चा भी उन कागजो में दिखाया गया है। मेरी समझ में नहीं आ रहा आखिर माजरा क्या है?”

“अभी तुम नए-नए सरपंच बने हो; इसलिए तुम्हें यह माजरा समझ में नहीं आ रहा है… थोड़े दिनों में सब समझ जाओगे।” बी.डी.ओ साहब भेदभरी हँसी हँसते हुए बोले, “...अगर तुम्हें उस नाले से दिक्कत है, जो कागजो में है...ऑन ग्राउंड नहीं है;तो तुम यह काम करो, पंचायत की तरफ़ से यह एप्लिकेशन लिखो-- -मेरे गाँव में फलां के घर से फलां के घर तक गली में एक गन्दा नाला है। जिसकी दुर्गन्ध से गलीवालों का बुरा हाल है। उस नाले की गन्दगी में पैदा होनें वाले मक्खी-मच्छरों से गाँव में बिमारी फैल जाने का खतरा है। अतः श्रीमान जी से अनुरोध है कि इस नाले को तुरंत भरवाया जाए।" 

यह एप्लिकेशन मोहर लगाकर हस्ताक्षर करके मेरे पास भेज देना। फिर पंचायत सचिव उस नाले का मुआवना करके मुझे रिपोर्ट देगा।”

“फिर क्या होगा?” सरपंच ने उत्सुकता से पूछा।

“…फिर यह होगा, जो नाला तीस साल पहले कागजों में खुदा था। वो कागजों में ही भर जाएगा। जिसे भरवाने के लिए मिट्टी, मजदूरी आदि का जो खर्चा मंजूर होगा उसमें से चुपचाप तुम्हारा हिस्सा तुम्हें मिल जाएगा।” बी.डी.ओ. साहब ने सरपंच को समझाया।

जिसे सुनकर, सरपंच बनते ही मोटी रकम मिलने की आशा से, सरपंच की बाँच्छे  खिल उठी; क्योंकि चुनाव में उसने जो खर्च किया था, उसे पूरा करने का तो उसका हक बनता था।

-सुनील शर्मा