चबूतरे पर अकेला बैठा रामाश्रय सामने खड़े बरगद को निहार रहा था। उसकी उम्र कितनी होगी, यह कोई नहीं जानता। उसके पिता और दादा ने भी उसे यहीं खड़ा देखा था।
रामाश्रय का बचपन उसी बरगद की छाँव में बीता था। मित्रों के साथ गिल्ली-डंडा और कंचे खेलना, लकड़ी के देशी झूले ‘रकचूच्याँ’ पर घंटों घूमना, पास के कुएँ पर रहट की चर्र-चर्र सुनना—सब कुछ मानो कल की ही बात हो। उसकी घनी छाँव में पशु सुस्ताते, पक्षी घोंसले बनाते और गाँव के लोग बैठकर रस्सियाँ बुनते हुए सुख-दुख बाँटते। आने वाली बारातों की अगवानी भी उसी बरगद के नीचे होती। वह केवल एक वृक्ष नहीं था, पूरे गाँव के जीवन का साक्षी था।
समय ने धीरे-धीरे सब कुछ बदल दिया।
एक भीषण तूफ़ान ने उसकी कई शाखाएँ तोड़ दीं। जो बचीं, वे भी सूख गईं। पत्ते झर गए। पक्षियों ने घोंसले छोड़ दिए। छाँव समाप्त हुई तो पशुओं का आना भी बंद हो गया। अब वह सूखे तने के सहारे निस्पंद खड़ा था—अपने गौरवशाली अतीत का एकमात्र प्रहरी।
रामाश्रय की आँखें बरगद पर टिकी रहीं। उसे लगा, समय ने केवल बरगद को ही नहीं, उसे भी भीतर तक सूखा दिया है। जिन बच्चों की किलकारियों से उसका आँगन गूँजता था, वे अपने-अपने संसार में दूर निकल गए थे। अब न किसी को उसकी छाँव चाहिए थी, न उसके अनुभव।
उसने एक गहरी साँस ली। सामने बरगद खड़ा था—और उसके भीतर एक दूसरा बरगद।
-टीकम चन्दर ढोडरिया
ई-मेल: teekamchanddhodria@gmail.com
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